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DU: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पी एस नरसिम्हा ने संवैधानिक व्याख्यान सम्मेलन को किया संबोधित; पढ़ें पूरी खबर
Sat, 05 Apr 2025 01:51 PM IST
शिवम गर्ग
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम गर्ग
Updated Sat, 05 Apr 2025 01:51 PM IST
सार
Delhi University: जस्टिस नरसिम्हा ने 'कर्तव्यम' को एक 'साधना' (आध्यात्मिक अनुशासन) के रूप में वर्णित किया, जो नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को सूर्य और सूर्य के प्रकाश से जोड़ता है, दोनों एक-दूसरे से अभिन्न और जीवनदायिनी होते हैं।
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दिल्ली विश्वविद्यालय, Delhi University
- फोटो : University Of Delhi
विस्तार
Delhi University Constitutional Lecture: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस पी एस नरसिम्हा ने शुक्रवार (5 अप्रैल) को दिल्ली विश्वविद्यालय के कैम्पस लॉ सेंटर की 'कर्तव्यम' लेक्चर श्रृंखला के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। इस अवसर पर जस्टिस नरसिम्हा ने अधिकारों और कर्तव्यों के अविभाज्यता पर जोर दिया और भारतीय परंपराओं, संवैधानिक मूल्यों और बी आर अंबेडकर जैसे महान विचारकों की शिक्षाओं का उल्लेख किया।
जस्टिस नरसिम्हा ने 'कर्तव्यम' को एक 'साधना' (आध्यात्मिक अनुशासन) के रूप में वर्णित किया, जो नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को सूर्य और सूर्य के प्रकाश से जोड़ता है, दोनों एक-दूसरे से अभिन्न और जीवनदायिनी होते हैं।
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जस्टिस नरसिम्हा ने 'कर्तव्यम' को एक 'साधना' (आध्यात्मिक अनुशासन) के रूप में वर्णित किया, जो नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को सूर्य और सूर्य के प्रकाश से जोड़ता है, दोनों एक-दूसरे से अभिन्न और जीवनदायिनी होते हैं।
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भारतीय संविधान के 75 वर्षों के उपलक्ष्य में श्रृंखला की शुरुआत
इस कार्यक्रम में भारत के अटॉर्नी जनरल एन. वेण्कटारमणि ने भी अपने विचार साझा किए और कर्तव्यों पर आधारित दृष्टिकोण से कानून बनाने का आह्वान किया, यहां तक कि एक "क्रांतिकारी मानव कर्तव्यों अधिनियम" का सुझाव दिया।दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस लेक्चर श्रृंखला की शुरुआत भारतीय संविधान के 75 वर्षों के उपलक्ष्य में की है। इस श्रृंखला का उद्देश्य भारतीय दार्शनिक और संवैधानिक धरोहर से जुड़े कर्तव्य पर आधारित कानूनी और सामाजिक विचारों को पुनः प्रकट करना है।
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