Chandrayaan 2: अभी खत्म नहीं हुआ है भारत का मून मिशन, जानें क्या कह रहे हैं वैज्ञानिक
- संपर्क टूटने से खत्म नहीं हुआ है भारत का दूसरा मून मिशन चंद्रयान 2
- पहले भी हो चुकी है इस तरह की घटना, वैज्ञानिक बोले- अब भी जारी है मून मिशन
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO - Indian Space Research Organisation) का दूसरा मून मिशन चंद्रयान 2 (Chandrayaan 2) अभी खत्म नहीं हुआ है। विज्ञान की भाषा में कहा जाए तो हमने बस थोड़ा खोया है।
विक्रम लैंडर को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करनी थी। शुरुआत के 13 मिनट तक तो लैंडर का सफर ठीक वैसा रहा जैसा प्लान किया गया था। लेकिन इसके चांद पर उतरने से कुछ मिनट पहले हमारा संपर्क इससे टूट गया।
अब इसके दो पहलू हो सकते हैं। पहला ये कि विक्रम लैंडर जरूरत से ज्यादा स्पीड के साथ चांद पर उतरा और क्रैश हो गया। यानी लैंडर ने क्रैश लैंडिंग की। दूसरा पहलू ये हो सकता है कि विक्रम लैंडर ने चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग कर ली हो। यानी यह ठीक उसी तरह उतरा हो जैसा प्लान किया गया था। लेकिन सफर के बीच में ग्राउंड स्टेशन से इसका संपर्क टूट गया। हालांकि ऐसा होने की संभावना कम है। लेकिन इसका पता तब ही चल सकता है जब हमारा संपर्क फिर से ऑर्बिटर व लैंडर के साथ स्थापित हो सके।
क्रैश लैंडिंग से भी खत्म नहीं होगा मिशन, क्या कहते हैं वैज्ञानिक
वैज्ञानिकों के अनुसार, अंतरिक्ष में किसी ऑब्जेक्ट से संपर्क टूट जाना कोई पहली घटना नहीं है। ऐसा पहले भी हो चुका है। अगर ऐसा हो जाए तो उस ऑब्जेक्ट के साथ दोबारा संपर्क स्थापित किया जा सकता है।
कुछ साल पहले इसरो के ही एक सैटेलाइट के साथ ऐसा हो चुका है। तब भी सैटेलाइट से ग्राउंड कंट्रोल का संपर्क टूट गया था। लेकिन कई कोशिशों और मैनुवरिंग के बाद संपर्क दोबारा स्थापित कर लिया गया। वह सैटेलाइट अपने ऑर्बिट में ही था।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर विक्रम लैंडर चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग करने में असफल भी रहा होगा, तो भी चंद्रयान 2 का मिशन यहां खत्म नहीं हो जाता। क्योंकि इस मिशन का काफी काम उन उपकरणों के जरिए किया जाना है जो ऑर्बिटर में लगाए गए हैं। इसमें चांद पर पानी ढूंढने का काम भी शामिल है। गौरतलब है कि चंद्रयान 2 का ऑर्बिटर बिल्कुल सही स्थिति में है और ग्राउंड स्टेशन से संपर्क में भी है।
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जबकि लैंडर और रोवर को वहां सिर्फ 14 दिनों के लिए काम करना था। यानी चांद पर उनके द्वारा किया जाने वाला शोध का कार्य भी सीमित था।
इसरो के एक सेवानिवृत्त वैज्ञानिक का कहना है कि 'विज्ञान की भाषा में मिशन अब भी काफी हद तक जीवित है। इसे अभी काफी कुछ देना बाकी है। अब तक यह खत्म नहीं हुआ है।'
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रोवर 'प्रज्ञान' में दो उपकरण लगाए गए थे जिनका काम था चांद की सतह के तत्वों (elemental composition) की जांच करना और लैंडिंग साइट के आसपास के मौजूद विभिन्न तत्वों का पता लगाना।
लैंडर 'विक्रम' में तीन उपकरण लगे हैं। इनका काम चांद के वातावरण, इसके तापमान और ऊष्म संवाहकता (Thermal Conductivity) का अध्ययन करना था। विक्रम लैंडर के एक उपकरण को ये भी पता करना था कि चांद की जिस सतह पर वह उतरा वहां भूकंपीय गतिविधियों की क्या स्थिति है।
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