मोदीराज में रोजगार की हालत, डिमांड ज्यादा, सप्लाई कम
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देश के लोगों के लिए अगर सबसे ज्यादा कोई जरूरी चीज है तो वह है नौकरी। ऐसा हम नहीं कह रहे, बल्कि वर्तमान आंकड़े बता रहे हैं।
आंकड़ों के अनुसार देश के अधिकांश बेरोजगार और नौकरी करने वाले वर्तमान में रोजगार की उपलब्धता पर खुश नहीं हैं। इतना ही नहीं पिछले तीन सालों के रोजगार ढूंढ़ने वालों की संख्या में भी भारी वृद्धि हुई है।
टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, रोजगार को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं उनमें लघु उद्योगों को लेकर भी कोई आशा नहीं दिख रही। वहीं नौकरी मांगने वालों में ग्रामीणों की संख्या में भी काफी बढ़ी है।
आठ करोड़ 40 लाख लोगों ने मांगा काम
आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस तेजी से काम या नौकरी की मांग बढ़ी है उस गति से रोजगार के अवसर नहीं बने यानी लोगों पर्याप्त मात्रा में काम नहीं मिला।
रोजगार को लेकर सामने आने वाले आंकड़े मनरेगा में काम के लिए मिलने वाले आवेदनों के आधार पर हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, 2013-14 में आठ करोड़ 30 लाख लोगों ने काम मांगा था जिनमें से सात करोड़ 40 लाख लोगों को काम मिला था यानी करीब 11 फीसदी लोगों को काम नहीं मिला था।
वहीं 2014-15 में सात करोड़ 30 लोगों ने मनरेगा के तहत आवेदन दिया था जिनमें से छह करोड़ 20 लाख लोगों को काम मिला। यानी इस साल 15 प्रतिशत लोगों को काम नहीं मिला।
इसी प्रकार 2015-16 में भी आठ करोड़ 40 लाख लोगों मनरेगा में काम के लिए आवेदन दिया जिसमें छह करोड़ 80 लाख लोगों को काम दिया गया और एक करोड़ 80 लाख लोगों को काम नहीं मिला। यानी 19 प्रतिश लोगों को मनरेगा में भी रोजगार नहीं मिला।
महात्मा गांधी नेशनल रोजागार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) तहत काम के लिए आवेदन करने वालों और काम पाने वालों के आंकड़े मिल रहे हैं जहां रोजगार की स्थिति ठीक नहीं है। लेकिन उन पढ़े लिखे लोगों के तो आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं जो सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहे हैं या आवेदन कर हैं। पढ़े लिखे लोगों को रोजगार के आंकड़े सामने आएं तो और भी खराब हालत सामने आ सकती है।