इतिहास के पन्नों से : वीर सावरकर का आरएसएस से नहीं था नाता, फिर भी संघ मानता है प्रणेता
महाराष्ट्र के नासिक के निकट भागुर गांव में जन्में वीर सावरकर एक भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे।
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भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी और राष्ट्रवादी नेता विनायक दामोदर सावरकर की 28 मई 2021 को 138वीं जयंती है। इस उपलक्ष पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर समेत कई लोगों ने सावरकर को नमन करते हुए श्रद्धांजलि दी है। लेकिन क्या आपको पता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के सदस्य न रहते हुए भी संघ परिवार में वीर सावरकर का नाम बहुत इज्जत और सम्मान के साथ लिया जाता है। जानिए क्या है वजह...
पूरे विश्व में भारत की एक सामूहिक "हिंदू" पहचान बनाने के लिए किया था यह काम
महाराष्ट्र के नासिक के निकट भागुर गांव में जन्में वीर सावरकर एक वकील, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाटककार थे। राजनीति में हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा को विकसित करने में सावरकर का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है। वो वीर सावरकर ही थे जिन्होंने पूरे विश्व में भारत की पहचान हिंदू के रूप में बनाने के लिए हिंदुत्व शब्द को गढ़ा था।
सावरकर के अनुसार यह थी हिंदुत्व की परिभाषा
सावरकर ने एक पुस्तक लिखी 'हिंदुत्व - हू इज़ हिंदू?' इस किताब में उन्होंने पहली बार राजनीतिक विचारधारा के तौर पर हिंदुत्व का इस्तेमाल किया था। वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने एक साक्षात्कार के दौरान बताया था कि सावरकर के हिसाब से भारत में रहने वाला व्यक्ति मूलत: हिंदू है और यही हिंदुत्व शब्द की परिभाषा है। जिस व्यक्ति की पितृ भूमि, मातृभूमि और पुण्य भूमि भारत हो वही इस देश का नागरिक है। हालांकि यह देश किसी भी पितृ और मातृभूमि तो बन सकती है, लेकिन पुण्य भूमि नहीं।
ऐसा था सावरकर का प्रभाव, विरोध के बाद भी जुटे हजारों लोग
वर्ष 1936 की बात है। किसी मुद्दे पर कांग्रेस के साथ सावरकर का मतभेद हो गया था। पार्टी के भीतर विरोध की आवाज तेज होने लगी थी। पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा सावरकर का विरोध किया जाने लगा था। लेकिन कांग्रेस के ही एक व्यक्ति ने सबके आक्रोश का सामना करते हुए सावरकर का साथ दिया। यह शख्स मशहूर पत्रकार, शिक्षाविद, कवि और नाटककार पीके अत्रे थे। अत्रे ने सावरकर के लिए पुणे में अपने बालमोहन थिएटर के कार्यक्रम में स्वागत कार्यक्रम का आयोजन किया। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद हजारों की संख्या में लोग इस कार्यक्रम में आए। इसी दौरान, अत्रे ने सावरकर को वीर की उपाधि से संबोधित किया था और यहीं से विनायक सावरकर का वीर सावरकर के नाम से मशहूर हो गए।
इस वजह से धूमिल हुई थी सावरकर की छवि
वर्ष 1949 में सावरकर पर गांधी हत्याकांड में शामिल होने का आरोप लगा था। अन्य आठ लोगों के साथ उन्हें भी इस साजिश में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। इस वजह से सावरकर की छवि पर बहुत धक्का लगा था। लेकिन ठोस सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया गया था।
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