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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जयंती: अखबार बेचने से राष्ट्रपति बनने तक, जानें मिसाइल मैन के संघर्ष की कहानी
Thu, 15 Oct 2026 06:31 AM IST
शिवम तिवारी
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम तिवारी
Updated Thu, 15 Oct 2026 06:31 AM IST
सार
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती पर जानिए उनके बचपन, अखबार बांटने के दिनों, वैज्ञानिक बनने के सफर और राष्ट्रपति पद तक पहुंचने की कहानी। मिसाइल मैन ने अपनी मेहनत, लगन और सोच से देश को नई दिशा दी। उनकी जिंदगी आज भी विद्यार्थियों और युवाओं को बड़े सपने देखने, असफलताओं से सीखने और अपने लक्ष्य के लिए लगातार मेहनत करने की प्रेरणा देती है।
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APJ Abdul Kalam Birth Anniversary
- फोटो : AI Generated
विस्तार
कभी सुबह-सुबह अखबार बांटने वाला एक बच्चा आगे चलकर देश के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपतियों में शामिल होगा, शायद उस समय किसी ने सोचा भी नहीं होगा। उसके पास न बड़े सपनों को पूरा करने के लिए बहुत साधन थे और न ही सफलता का कोई आसान रास्ता। लेकिन उसके भीतर कुछ नया सीखने, विज्ञान को समझने और देश के लिए कुछ करने की चाह थी। यही बच्चा आगे चलकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम बना, जिन्हें दुनिया ने ‘मिसाइल मैन ऑफ इंडिया’ और भारत के राष्ट्रपति के रूप में पहचाना। उनकी कहानी केवल सफलता की नहीं, बल्कि संघर्ष, असफलता, मेहनत और उन सपनों की है, जो मुश्किल हालात में भी टूटने नहीं चाहिए। 15 अक्टूबर को उनकी जयंती पर आइए जानते हैं उनके जीवन के उन पहलुओं को, जो आज भी विद्यार्थियों और युवाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
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कहां हुआ था कलाम का जन्म और कैसा था परिवार?
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का पूरा नाम अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम था। उनका जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। उनके पिता जैनुलाब्दीन एक नाव के मालिक थे और धार्मिक कार्यों से भी जुड़े थे। उनकी मां आशियम्मा घर संभालती थीं। उनका परिवार साधारण था और आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। रामेश्वरम धार्मिक महत्व वाला स्थान है, जहां अलग-अलग समुदायों के लोग मिल-जुलकर रहते थे। कलाम के बचपन पर इस माहौल का असर पड़ा। उन्होंने सादगी, अनुशासन और सभी धर्मों के प्रति सम्मान जैसे मूल्य अपने परिवार से सीखे।
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बचपन में अखबार क्यों बांटते थे कलाम?
कलाम का बचपन ऐसे समय में बीता, जब परिवार की मदद करना भी उनकी जिम्मेदारी बन गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रामेश्वरम में अखबारों के वितरण से जुड़े काम में उन्हें अवसर मिला। उन्होंने अपने रिश्तेदार के साथ अखबार बांटने का काम किया और परिवार की आय में सहयोग दिया। सुबह जल्दी उठकर काम करना और इसके बाद पढ़ाई करना उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा था। इस जिम्मेदारी ने उन्हें समय का महत्व समझाया। हालांकि, अखबार बांटने का काम उनकी पहचान नहीं बना, बल्कि उनके संघर्ष का एक हिस्सा रहा। आगे चलकर उन्होंने अपनी मेहनत और ज्ञान के दम पर विज्ञान की दुनिया में अलग मुकाम हासिल किया।
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