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Hindi News ›   Delhi ›   World Bipolar Day: All the desires of life get shattered in a moment

World Bipolar Day : जिंदगी के सभी अरमान पल भर में हो जाते हैं धड़ाम, जरूरी है समय पर उपचार

Thu, 30 Mar 2023 06:13 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 30 Mar 2023 06:13 AM IST
सार

काम शुरू ही किया था कि अचानक निराशा ने घेर लिया। हर समय उदास और अकेले रहने लगे। परेशान होकर परिवार उन्हें उपचार करवाने डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग विभाग लेकर आए। यहां जांच में पता चला कि वह बाइपोलर रोग से पीड़ित हैं।

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World Bipolar Day: All the desires of life get shattered in a moment
सांकेतिक तस्वीर...

विस्तार

एक वक्त ऐसा भी था जब ऊर्जा से भरे दिलीप के हौसले बुलंद थे। पैसे की कमी नहीं थी। लगता था कि सब कुछ कर सकते हैं। नया काम शुरू करने का फैसला कर पांच करोड़ का टेंडर हासिल किया। काम शुरू ही किया था कि अचानक निराशा ने घेर लिया। हर समय उदास और अकेले रहने लगे। परेशान होकर परिवार उन्हें उपचार करवाने डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग विभाग लेकर आए। यहां जांच में पता चला कि वह बाइपोलर रोग से पीड़ित हैं।

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यह एक ऐसा मनोरोग है जिसका पीड़ित कभी आत्मविश्वास से लबरेज रहता है तो कभी खुद पर उसका यकीन न्यूनतम भी नहीं रहता। पीड़ित व्यक्ति अपनी जिंदगी में बैलेंस नहीं बना पाता। उसकी जिंदगी स्याह और सफेद के दो ध्रुवों में बंट जाती है। देश में एक हजार लोगों में से 5-10 मरीज इस रोग के मिलते हैं। 
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समय पर उपचार से हो जाते हैं ठीक
ऐसे मरीजों को यदि समय पर उपचार मिले तो वह पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं। इन्हें समय पर अपनी दवाइयां लेनी चाहिए, यदि वह ठीक भी हो गए तो बिना डॉक्टर की सलाह से दवाई बंद नहीं करनी चाहिए। इसके उपचार में लापरवाही काफी महंगा पड़ सकती है। कई बार मरीज परेशान होकर गलत फैसले कर लेता है जिस कारण उसे और उसके परिवार को काफी समस्या झेलनी पड़ती है। -प्रोफेसर डॉ. लोकेश सिंह श्रीवास्तव, मनोरोग विशेषज्ञ, डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल
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माता और पिता से बच्चों में होने का खतरा ज्यादा
अगर किसी के माता पिता में यह बीमारी थी तो अगली पीढ़ी को भी होने की आशंका रहती है। माता के गर्भ में एक ही अंडे से जन्मे दो जुड़वा बच्चों (मोनो जिगोटिक ट्विन) में इसके होने की दर 75 प्रतिशत और माता के दो अलग अलग अंडाणुओं के पिता के अलग अलग शुक्राणुओं से निषेचन से जन्मे बच्चों (डाई जिगोटिक ट्विंस) में यह 25 प्रतिशत देखने को मिलती है।


कई बार हमारे मस्तिष्क में पाए जाने वाले न्यूरो केमिकल्स के स्तर में कमी या बढ़ोतरी से भी यही रोग होता है। अगर मस्तिष्क में सेरोटोनिन, डोपामिन और नोरएपिनेफ्रीन का स्तर बहुत ही कम है तो ऐसे लोगों में डिप्रेशन अधिक रहता है लेकिन अगर इन रसायनों का स्तर बहुत ज्यादा हो जाए तो व्यक्ति अधिक उन्मादी, गुस्सैल और आक्रामक हो जाता है। इन्हें नजरअंदाज न करें। - डॉ अंकित दराल, पूर्व मनोरोग विशेषज्ञ, जीटीबी अस्पताल

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