ऑर्डर-ऑर्डर : 23 अगस्त तक नहीं होगी लक्खा की गिरफ्तारी, पठान की जमानत पर फैसला सुरक्षित
- पुलिस को किसानों को उकसाने संबंधी सिधाना का वीडियों पेश करने का निर्देश
- पठान ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए कहा कि वह अपराध के अनुमान के आधार पर 495 दिनों से जेल में बंद है। ऐसे में उसकी जमानत स्वीकार की जाए
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अदालत ने पुलिस को उस वीडियो को पेश करने का निर्देश दिया है जिसमें किसानों की रैली के बाद लाल किले पर गणतंत्र दिवस हिंसा के आरोपी लक्खा सिधाना ने कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों को दिन में तय रास्ते से हटने के लिए उकसाया। अदालत ने साथ ही सिधाना की गिरफ्तारी पर रोक 23 अगस्त तक बढ़ा दी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गगनदीप सिंह ने जांच अधिकारी को उस वीडियो फुटेज को पेश करने को कहा है जो जांच का हिस्सा है और उसके आधार पर सिधाना को आरोपी बनाया गया है। साथ ही अदालत ने किसानों को भड़काने वाले अन्य आरोपियों के संबंध में स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।
सिधाना की और से पेश अधिवक्ता रमेश गुप्ता व जगदीप सिंह ने अदालत को बताया कि उके मुवक्किल को फर्जी मामले में फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि सिधाना ने विरोध करने के अपने अधिकारों के तहत शांति पूर्ण तरीके से इस प्रदर्शन में शामिल हुआ था। उन्होंने कहा कि सिधाना न सोशल मीडिया न ही ब्रीफिंग में कभी प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाया है। वहीं याची कई बार जांच में शामिल हुआ है।
सरकारी वकील जीएस गुराया ने दलील दी कि सिधाना जांच में सहयोग नहीं कर रहा और उससे हिरासत में पूछताछ की जरूरत थी है। उन्होंने बताया कि सिधाना अपने मोबाइल फोन से संबंधित सवालों के संबंध में गोलमाल कर रहा है और कहा है कि मोबाइल खो गया है। दूसरी ओर उसके द्वारा उपलब्ध कराए गए मोबाइल फोन का पासवर्ड नहीं बताया।
फैसला सुरक्षित
अदालत ने वर्ष 2020 में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान दिल्ली पुलिस के एक हेड कांस्टेबल पर पिस्तौल तानने के आरोपी शाहरुख पठान की हत्या के प्रयास मामले में जमानत पर फैसला सुरक्षित रख लिया। पठान ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए कहा कि वह अपराध के अनुमान के आधार पर 495 दिनों से जेल में बंद है। ऐसे में उसकी जमानत स्वीकार की जाए।
यह मामला हेड कांस्टेबल दीपक दहिया पर पिस्तौल तानने का है जबकि दूसरा मामला पूर्वोत्तर दिल्ली में हिंसा के दौरान रोहित शुक्ला नामक एक व्यक्ति की हत्या का प्रयास है। वह अभी तिहाड़ जेल में बंद है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष आरोपी ने अधिवक्ता खालिद अख्तर ने कहा कि रोहित शुक्ला के बयान में विरोधाभास है और जांच में देरी हुई है और कथित घटना के स्थल पर उसकी मौजूदगी का कोई सबूत नहीं है। पठान के वकील ने कहा कि इस मामले में पूरी जांच अनुमान पर आधारित है और बिना किसी सबूत के और विरोधाभासी बयानों के बावजूद उसे 495 दिनों से जेल में रखा गया है।
उन्होंने अदालत से कहा कि पैर में गोली लगने से घायल शुक्ला पुलिस को दिए अपने पहले बयान में आरोपी की पहचान नहीं कर सका और बाद में पहचाना जो विरोधाभास को दर्शाता है। यह कथित घटना मौजपुर चौक की है।
उन्होंने कहा कि सीसीटीवी या सीडीआर भी शुक्ला की घटना पर होने की पुष्टी नहीं हो रही। इस मामले में पठान समेत पांच आरोपी हैं। एक आरोपी सलमान ने वकील अब्दुल गफ्फार के जरिए सबूतों के अभाव में बरी करने का अनुरोध किया है।
विशेष लोक अभियोजक अनुज हांडा ने पठान की जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि उसके फरार होने की आशंका है। उन्होंने कहा ऐसी आशंका है कि आरोपी फरार हो सकता है। वह पहले भी भाग गया था और बड़ी मुश्किल से उसे पकड़ा गया। ऐसे में जमानत प्रदान न की जाए।
माता-पिता को फटकार
घर के सामने कुत्तों के शौक का विरोध करने पर एक व्यक्ति को चार बच्चियों से यौन शोषण के झूठे मामले में फंसा दिया। अदालत ने उसे यौन उत्पीड़न के इस मामले से बरी कर दिया। अदालत ने कहा उसे दलित समुदाय से संबंध रखने वाले माता-पिता के प्रतिकूल स्वभाव के कारण झूठा फंसाया गया था।
बाल संरक्षण यौन अपराध (पॉक्सो) अधिनियम के प्रावधानों के तहत मुकदमे की सुनवाई कर रहे जिला एवं सत्र न्यायाधीश धर्मेश शर्मा ने अपने अहम फैसले में सरकार को दो महीने के भीतर आरोपी को एक लाख रुपये बतौर मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि यह एक प्रतीकात्मक राशि और उसके कानूनी अधिकारों और विवादों के प्रति पूर्वाग्रह के बिना है।
अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने चार नाबालिग बच्चियों का यौन उत्पीड़न किया है। आरोपी 18 मई 2015 से जेल में था।सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि उनके मुवकिकल को फर्जी मामले में फंसाया गया है क्यों व दलित समुदाय से है और शिकायतकर्ता उच्च जाति से है। उन्होंने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता के कुत्ते को बार-बार अपने घर के बाहर शौच करने को लेकर उनका कई मौकों पर झगड़ा हुआ था।
अदालत ने कहा कि पीड़ित लड़कियों की गवाही उनके माता-पिता की तुलना में जांच की अभियोजन पक्ष के मामले को अत्यधिक असंभव बनाता है और इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अभियुक्त के प्रति माता-पिता के प्रतिकूल स्वभाव के कारण आरोपी को झूठा फंसाया गया। अदालत ने माना कि कुत्तों के उनके घर के समक्ष शौच के कारण हुए झगड़े लेकर उसे यौन शोषण के मामले में फंसा दिया क्योंकि वह दलित समुदाय से संबंध रखता है।
अदालत ने कहा कि पीड़ितो के बयानों से स्पष्ट है कि उन्होंने अपने माता-पिता के इशारे पर यौन उत्पीउ़न का आरोप लगाया। अदालत ने ऐसे झूठे आरोप लगाने पर बच्चियों के माता-पिता को फटकार लगाते हुए कहा कि उन्होंने अपनी बेटियों को सबसे बेशर्म और बेशर्म तरीके से भयावह कृत्य में लिप्त किया यह भी मात्र इस कारण कि आरोपी के खिलाफ आरोप गंभीर थे।
अदालत ने पुलिस को भी फटकार लगाते हुए कहा कि जांच बिल्कुल ढुलमुल और उसमें वस्तुनिष्ठता की कमी रही है। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी की गवाही से पता चलता है कि वह आरोपियों के खिलाफ अपनी जांच में निष्पक्षता दिखाने के लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन में पूरी तरह से विफल रहा।
वहीं मामले में एमिकस क्यूरी अधिवक्ता अभिजीत अशोक भगत ने कोर्ट को बताया आरोपी को ऊंची जाति के शिकायतकर्ता पक्ष ने दलित समुदाय होने के नाते फंसाया था क्योंकि उसने उनके कुत्तों को वश में करने को कहा था।