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Delhi: संघ प्रमुख मोहन भागवत बोले- सीखने के होते हैं अलग-अलग तरीके, मां का सहारा होता है आजीवन भावनात्मक

Fri, 24 Jul 2026 09:25 PM IST
Digvijay Singh एजेंसी, आईएएनएस दिल्ली
एजेंसी, आईएएनएस दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Fri, 24 Jul 2026 09:25 PM IST
सार

मोहन भागवत ने बताया कि समय के साथ चलना भी मातृत्व का एक स्वाभाविक पहलू है। इस पर चर्चा की आवश्यकता नहीं होती, यह अपने आप होता है। इन्सान समय के साथ अपने तौर-तरीके बदलता रहता है।

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RSS Chief Mohan Bhagwat said there are various ways of learning and a mother provides lifelong emotional suppo
संघ प्रमुख मोहन भागवत - फोटो : ians

विस्तार

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विभिन्न विषयों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने देश की खोई हुई परंपराओं और विदेशी हमलों के प्रभावों पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही उन्होंने समय के साथ बदलाव और मां के आजीवन भावनात्मक सहारे की आवश्यकता पर भी जोर दिया। मोहन भागवत ने कहा कि कुछ चीजें एक बार खो जाने के बाद फिर कभी वापस नहीं आईं। हमलों के सिलसिले के कारण हमें ऐसी कई बातें अपनानी पड़ीं जो हमारी परंपरा का हिस्सा नहीं थीं। ये चीजें हमारी सोच के अनुरूप भी नहीं थीं। कुछ बदलाव सुरक्षा के लिए किए गए, जबकि कुछ विदेशी हमलावरों के दबाव में हुए।

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मोहन भागवत ने बताया कि समय के साथ चलना भी मातृत्व का एक स्वाभाविक पहलू है। इस पर चर्चा की आवश्यकता नहीं होती, यह अपने आप होता है। इन्सान समय के साथ अपने तौर-तरीके बदलता रहता है। चाहे उन्हें कोई राह दिखाने वाला मिले या न मिले, वे अनुभव से सीखते हैं।
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अनुभव से सीखना
भागवत के अनुसार, सीखने के अलग-अलग तरीके होते हैं। यदि कोई राह दिखाने वाला न हो, तो इन्सान अपने अनुभव से सीखता है। यह सीखने का सबसे कड़वा तरीका माना जाता है। इसमें व्यक्ति को बहुत कुछ सहना पड़ता है, लेकिन वह निश्चित रूप से सीख जाता है।


मां का आजीवन भावनात्मक सहारा
मोहन भागवत ने कहा कि मां की जरूरत इन्सान को जिंदगी भर रहती है, सिर्फ बचपन में ही नहीं। दस-बारह साल की उम्र के बाद बच्चा बड़ा होने पर बात कम मानने लगता है। वह सबसे पहले मां की ही बात नहीं मानता। पिता की बात न मानने पर डांट पड़ सकती है, पर मां से यह डर नहीं होता। इसलिए बच्चा पलटकर जवाब देता है और जिद करता है। जिंदगी में सीधी शिक्षा की जरूरत न रहने पर भी भावनात्मक सहारे की जरूरत बनी रहती है। मां ही वह स्वाभाविक और हमेशा उपलब्ध जगह है जहां इन्सान रो सके और शांति पा सके। इसलिए, इन्सान को जिंदगी भर इसकी जरूरत रहती है।

 


 


 
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