Delhi: संघ प्रमुख मोहन भागवत बोले- सीखने के होते हैं अलग-अलग तरीके, मां का सहारा होता है आजीवन भावनात्मक
मोहन भागवत ने बताया कि समय के साथ चलना भी मातृत्व का एक स्वाभाविक पहलू है। इस पर चर्चा की आवश्यकता नहीं होती, यह अपने आप होता है। इन्सान समय के साथ अपने तौर-तरीके बदलता रहता है।
विस्तार
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विभिन्न विषयों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने देश की खोई हुई परंपराओं और विदेशी हमलों के प्रभावों पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही उन्होंने समय के साथ बदलाव और मां के आजीवन भावनात्मक सहारे की आवश्यकता पर भी जोर दिया। मोहन भागवत ने कहा कि कुछ चीजें एक बार खो जाने के बाद फिर कभी वापस नहीं आईं। हमलों के सिलसिले के कारण हमें ऐसी कई बातें अपनानी पड़ीं जो हमारी परंपरा का हिस्सा नहीं थीं। ये चीजें हमारी सोच के अनुरूप भी नहीं थीं। कुछ बदलाव सुरक्षा के लिए किए गए, जबकि कुछ विदेशी हमलावरों के दबाव में हुए।
Delhi: RSS chief Mohan Bhagwat says, "...But some things, once lost, remained lost and did not come into focus. After that, a series of invasions began. Due to this, many things that were not part of our tradition and were not in the direction of our thoughts had to be accepted… pic.twitter.com/hCtKYvo6YA
— IANS (@ians_india) July 24, 2026
मोहन भागवत ने बताया कि समय के साथ चलना भी मातृत्व का एक स्वाभाविक पहलू है। इस पर चर्चा की आवश्यकता नहीं होती, यह अपने आप होता है। इन्सान समय के साथ अपने तौर-तरीके बदलता रहता है। चाहे उन्हें कोई राह दिखाने वाला मिले या न मिले, वे अनुभव से सीखते हैं।
Delhi: RSS chief Mohan Bhagwat says, "Being in accordance with the times is also a subject of motherhood that does not require discussion. It happens on its own. Human beings change all their ways according to time. Whether they find someone to enlighten them or not, they learn… pic.twitter.com/qPkNB2K7Y8
— IANS (@ians_india) July 24, 2026
अनुभव से सीखना
भागवत के अनुसार, सीखने के अलग-अलग तरीके होते हैं। यदि कोई राह दिखाने वाला न हो, तो इन्सान अपने अनुभव से सीखता है। यह सीखने का सबसे कड़वा तरीका माना जाता है। इसमें व्यक्ति को बहुत कुछ सहना पड़ता है, लेकिन वह निश्चित रूप से सीख जाता है।
मां का आजीवन भावनात्मक सहारा
मोहन भागवत ने कहा कि मां की जरूरत इन्सान को जिंदगी भर रहती है, सिर्फ बचपन में ही नहीं। दस-बारह साल की उम्र के बाद बच्चा बड़ा होने पर बात कम मानने लगता है। वह सबसे पहले मां की ही बात नहीं मानता। पिता की बात न मानने पर डांट पड़ सकती है, पर मां से यह डर नहीं होता। इसलिए बच्चा पलटकर जवाब देता है और जिद करता है। जिंदगी में सीधी शिक्षा की जरूरत न रहने पर भी भावनात्मक सहारे की जरूरत बनी रहती है। मां ही वह स्वाभाविक और हमेशा उपलब्ध जगह है जहां इन्सान रो सके और शांति पा सके। इसलिए, इन्सान को जिंदगी भर इसकी जरूरत रहती है।