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मुजफ्फरपुर शेल्टर होम दुष्कर्म मामले में बृजेश ठाकुर ने उम्रकैद को दी चुनौती
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नई दिल्ली। बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में कई लड़कियों के साथ दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे मुख्य दोषी बृजेश ठाकुर ने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले में दिल्ली की साकेत जिला अदालत ने जनवरी में बृजेश ठाकुर को दोषी ठहराया था। दोषी ने फैसले को चुनौती देते हुए उसे खारिज करने की मांग की है।
निचली अदालत ने ठाकुर को 11 फरवरी को अंतिम सांस तक जेल में रखने का आदेश दिया था। ठाकुर को कई लड़कियों के यौन उत्पीड़न के मामले में पोक्सो अधिनियम और दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई थी। अदालत ने ठाकुर पर 32.20 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था। अदालत ने बाकी अभियुक्तों को भी उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में ठाकुर की ओर से याचिका दायर कर अधिवक्ता प्रमोद दुबे ने दलील दी है कि निचली अदालत द्वारा मामले में जल्दबाजी में सुनवाई की गई जो संविधान के तहत प्रदत्त स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई के उसके अधिकार का उल्लंघन है। यह भी कहा गया है कि ठाकुर की पौरुष जांच न तो बिहार पुलिस और न ही सीबीआई ने करवाई। दुष्कर्म जैसे मामले में किसी को भी दोषी ठहराने से पहले उसकी पौरुष क्षमता का भी परीक्षण किया जाना चाहिए क्योंकि यह अभियुक्त का अधिकार है।
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याचिका में दवा किया गया कि साकेत कोर्ट के विशेष न्यायाधीश (पोक्सो) ने ठाकुर को दोषी ठहराते हुए कानूनी रूप से अनुचित सबूतों पर भरोसा किया है और अभियोजन पक्ष के गवाह की भूमिका को संभावित स्पष्टीकरण देकर स्वीकार किया है, जो न तो अभियोजन पक्ष के गवाहों द्वारा कहा गया है और न ही दर्ज किया गया है। निचली अदालत का फैसला अवैध, गलत, विकृत और रिकॉर्ड के साक्ष्य के विपरीत है।
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निचली अदालत ने ठाकुर को 11 फरवरी को अंतिम सांस तक जेल में रखने का आदेश दिया था। ठाकुर को कई लड़कियों के यौन उत्पीड़न के मामले में पोक्सो अधिनियम और दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई थी। अदालत ने ठाकुर पर 32.20 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था। अदालत ने बाकी अभियुक्तों को भी उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
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हाईकोर्ट में ठाकुर की ओर से याचिका दायर कर अधिवक्ता प्रमोद दुबे ने दलील दी है कि निचली अदालत द्वारा मामले में जल्दबाजी में सुनवाई की गई जो संविधान के तहत प्रदत्त स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई के उसके अधिकार का उल्लंघन है। यह भी कहा गया है कि ठाकुर की पौरुष जांच न तो बिहार पुलिस और न ही सीबीआई ने करवाई। दुष्कर्म जैसे मामले में किसी को भी दोषी ठहराने से पहले उसकी पौरुष क्षमता का भी परीक्षण किया जाना चाहिए क्योंकि यह अभियुक्त का अधिकार है।
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याचिका में दवा किया गया कि साकेत कोर्ट के विशेष न्यायाधीश (पोक्सो) ने ठाकुर को दोषी ठहराते हुए कानूनी रूप से अनुचित सबूतों पर भरोसा किया है और अभियोजन पक्ष के गवाह की भूमिका को संभावित स्पष्टीकरण देकर स्वीकार किया है, जो न तो अभियोजन पक्ष के गवाहों द्वारा कहा गया है और न ही दर्ज किया गया है। निचली अदालत का फैसला अवैध, गलत, विकृत और रिकॉर्ड के साक्ष्य के विपरीत है।