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जीवन पर संकट: दिल्ली में करीब एक हजार अफगानी परिवार, रेहड़ी-पटरी से लेकर ढाबा चलाने का करते हैं काम
Tue, 17 Aug 2021 11:14 PM IST
प्राची प्रियम
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: प्राची प्रियम
Updated Tue, 17 Aug 2021 11:14 PM IST
सार
दिल्ली में करीब एक हजार अफगानी परिवार, रेहड़ी-पटरी से लेकर ढाबा चलाने का काम करते हैं। ऐसे कई अफगानी युवक हैं जिन्होंने गुजर बसर के लिए अपने मुल्क में सब कुछ छोड़कर छोटे मोटे कारोबार शुरू करने का फैसला लिया है।
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अफगानिस्तान से लौटे इमरान और अली
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
तालिबान के कब्जे में जाने के बाद अफगानी युवक इमरान ने अफगानिस्तान छोड़ दिया। करोड़ों की जमीन और कारोबार को छोड़ दिल्ली पहुंचे इमरान अब अपनी जिंदगी के लिए नई जमीन तलाश रहे हैं। इलाज के सिलसिले में भारत आए 28 वर्षीय युवक को नहीं मालूम था कि अब उन्हें अफगानिस्तान से बाहर ही गुजर बसर करना पड़ सकता है। इमरान सरीखे कई अफगानी युवक हैं जिन्होंने गुजर बसर के लिए अपने मुल्क में सब कुछ छोड़कर छोटे मोटे कारोबार शुरू करने का फैसला लिया है।
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इमरान के मुताबिक, काबुल में करीब तीन करोड़ का ऑटो पार्ट्स का कारोबार था। वहीं, जमीन भी अच्छी खासी है। जिंदगी बहुत अच्छे से गुजर हो रही थी। करीब 15 दिन पहले अफगानिस्तान से रवाना होने से पहले सोचा भी नहीं था कि वापस लौटना मुश्किल होगा। पिता अमेरिकी फौज के साथ बारूदी सुरंग को निष्क्रिय करने में जुटे थे, इसलिए तालिबानी उन्हें दुश्मन के तौर पर देखते हैं। ऐसे में जमीन और जायदाद छोड़कर, पलायन के लिए मजबूर हैं। अब कोशिश पिता और परिवार को वहां से निकालने की है, जिससे अपने साथ उनकी जान भी बचाई जा सके।
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अफगानिस्तान के अलग अलग प्रांतों से भारत पहुंच रहे युवकों की चिंता है कि उनके पास अब न तो वहां जमीन, मकान या कारोबार है। बैंकों में जमा राशि भी मिलने की उम्मीद नहीं है। पलायन की रफ्तार बढ़ने से अब रोटी, तंदूर, बर्गर, अफगानी रोल, फलाफल बर्गर सरीखे काम शुरू करने लगे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने मनी एक्सचेंज, एयर टिकटिंग के अलावा रेस्तरां और किराये पर गेस्ट हाउस भी चला रहे हैं। पहले से रह रहे शरणार्थियों का भी उन्हें सहयोग मिल रहा है।
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1000 परिवारों को सता रही है गुजर बसर की चिंता
एक रेस्तरां की मालिक बबिता ने बताया कि अफगानिस्तान में तालिबान के दखल से उनका कारोबार प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि पहले से यहां रह रहे शरणार्थियों को यहां कई तरह की सहूलियतें नहीं मिल पा रही हैं। माकूल दस्तावेज न होने की वजह से करीब 1000 से अधिक परिवारों के चार हजार से अधिक शरणार्थियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि अपना गुजारा कैसे करें।
सरकार से की जाने वाली पहल से राहत मिल सकती है। दिल्ली में लाजपत नगर, तिलक नगर, मालवीय नगर, भोगल सहित नोएडा, ग्रेटर नोएडा में भी अफगानी शरणार्थी रह रहे हैं। इन्हें शरणार्थी के तौर पर मिलने वाली सुविधा के लिए इंटरव्यू और यहां रहने का मजबूत आधार न होने की वजह से आगे की चिंता सता रही है।
सेना में 10 साल काम करने के बाद बेच रहे हैं अफगानी रोल
10 साल तक अफगानी फौज में काम कर चुके उम्मेद अब लाजपत नगर में अफगानी रोल-बर्गर बेचकर गुजारा कर रहे हैं। तालिबान से पहले हुए संघर्ष को याद कर कहते हैं, अब वहां जाने का कोई मतलब नहीं। हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि खुली हवा में सांस लेना भी मुश्किल है। यहां कुछ काम कर, जिंदगी गुजार लेंगे। नौ महीने से अफगानी रोल, फलाफल बर्गर, वेज और चिकन बर्गर बेच रहे हैं।
संपत्ति तो दूर सिम खरीदना भी हुआ मुश्किल
अफगानी सेना से काम एक युवक ने बताया कि पिछले छह साल से लाजपत नगर में रह रहे हैं। अफगानिस्तान सहित दूसरे देशों से पहुंचने वालों को गेस्ट हाउस में रहने की सुविधा मुहैया करवा रहे हैं। हालांकि शरणार्थी के तौर पर रहने वालों को यहां संपत्ति खरीदना तो दूर सिम खरीदने की भी इजाजत नहीं है। लेकिन गुजर बसर करने के लिए अपनी सुविधा के मुताबिक कारोबार कर रहे हैं।
पारीकी बेच कर समझ रहे हैं जिंदगी की बारीकी
अली के साथ तीन दोस्त अब पारीकी, तंदूरी रोटी और नान बेचकर गुजारा कर रहे हैं। अली ने यूरोपीय देशों में शेफ के तौर पर काम किया है, लेकिन अब दोबारा लौटना नहीं चाहते हैं। रोजाना करीब 200 पारीकी और रोटियां बेचकर 4000-5000 कमाने वाले तीनों दोस्त किराये के मकान पर रह रहे हैं। एक कमरे के लिए औसतन आठ हजार रुपये खर्च कर रहे हैं।
संपत्ति तो दूर सिम खरीदना भी हुआ मुश्किल
अफगानी सेना से काम एक युवक ने बताया कि पिछले छह साल से लाजपत नगर में रह रहे हैं। अफगानिस्तान सहित दूसरे देशों से पहुंचने वालों को गेस्ट हाउस में रहने की सुविधा मुहैया करवा रहे हैं। हालांकि शरणार्थी के तौर पर रहने वालों को यहां संपत्ति खरीदना तो दूर सिम खरीदने की भी इजाजत नहीं है। लेकिन गुजर बसर करने के लिए अपनी सुविधा के मुताबिक कारोबार कर रहे हैं।
पारीकी बेच कर समझ रहे हैं जिंदगी की बारीकी
अली के साथ तीन दोस्त अब पारीकी, तंदूरी रोटी और नान बेचकर गुजारा कर रहे हैं। अली ने यूरोपीय देशों में शेफ के तौर पर काम किया है, लेकिन अब दोबारा लौटना नहीं चाहते हैं। रोजाना करीब 200 पारीकी और रोटियां बेचकर 4000-5000 कमाने वाले तीनों दोस्त किराये के मकान पर रह रहे हैं। एक कमरे के लिए औसतन आठ हजार रुपये खर्च कर रहे हैं।