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दिल्ली: डिफेंस कॉलोनी में सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से निर्मित मंदिर को 10 दिनों में हटाने का निर्देश

Mon, 20 Dec 2021 09:08 PM IST
सुशील कुमार अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: सुशील कुमार Updated Mon, 20 Dec 2021 09:08 PM IST
सार

अदालत ने दिल्ली पुलिस को उक्त अतिक्रमण हटाने का निर्देश देते हुए पीडब्ल्यूडी विभाग को आवश्यक सहायता मुहैया कराने का भी निर्देश दिया है।

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Instruction to remove illegally built temple on public land in Defense Colony in 10 days
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : प्रतापगढ़

विस्तार

उच्च न्यायालय ने सोमवार को दिल्ली सरकार को दस दिनों की अवधि के भीतर डिफेंस कॉलोनी इलाके में एक सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से निर्मित एक मंदिर को हटाने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने विरहत सैनी द्वारा अपनी निजी संपत्ति के सामने मौजूद कथित अतिक्रमण को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है। 

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याचिका में तर्क रखा गया कि कोविड-19 महामारी के दौरान सार्वजनिक भूमि पर उनकी निजी संपत्ति के सामने मौजूद एक फुटपाथ पर अवैध रूप से मंदिर का निर्माण किया गया। अदालत ने दिल्ली पुलिस को उक्त अतिक्रमण हटाने का निर्देश देते हुए पीडब्ल्यूडी विभाग को आवश्यक सहायता मुहैया कराने का भी निर्देश दिया है। अदालत ने क्षेत्रीय थानाध्यक्ष को मंदिर में रखी मूर्तियों को पास के मंदिर में रखने का निर्देश दिया है ताकि इन मूर्तियों की पवित्रता बनी रहे।
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अक्तूबर माह में दिल्ली सरकार ने न्यायालय को अवगत कराया था कि उपराज्यपाल के आदेश के तहत गठित धार्मिक समिति की पूर्व स्वीकृति प्राप्त किए बिना कोई भी धार्मिक संरचना, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, को तोड़ा नहीं जा सकता। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पीवी कपूर ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के आलोक में सार्वजनिक भूमि पर किसी भी अतिक्रमण की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि प्रतिवादियों ने 29 सितंबर 2021 को स्वयं उच्च न्यायालय को आश्वासन दिया था कि वे अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हैं और अनधिकृत ढांचे को ध्वस्त करने के लिए तत्काल कदम उठाएंगे।
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दिल्ली सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त स्थायी वकील अनुपम श्रीवास्तव ने धार्मिक समिति को विचाराधीन ढांचे को गिराने का प्रस्ताव भेजने के लिए समय की प्रार्थना की। अदालत ने उनके तर्क को खारिज करते हुए कहा जब सर्वोच्च न्यायालय ने 2009 में खुद ही निर्देश दिया था कि ऐसा नहीं है मंदिरों आदि के नाम पर किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश द्वारा अनाधिकृत निर्माण की अनुमति दी जाएगी। ऐसे में सरकार या अन्य पक्ष को इस दलील का आश्रय लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती है कि मामले को अभी भी धार्मिक समिति को भेजने की आवश्यकता है इसके अलावा स्वयं उनकी और से पेश रिपोर्ट में स्पष्ट है कि विषय अतिक्रमण का वास्तव में धार्मिक ढांचे के रूप में उपयोग नहीं किया जा रहा है, क्योंकि न तो कोई साइट पर पूजा कर रहा है और न ही कोई पुजारी मौजूद है।


अदालत ने कहा इस बात का कोई कारण नहीं दिखता कि अतिक्रमण को आगे जारी रखने की अनुमति क्यों दी जाए। जब सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही निर्देश दिया है कि किसी भी अनाधिकृत निर्माण की अनुमति नहीं दी जाएगी, इसका कोई कारण नहीं है कि प्रतिवादी को अतिक्रमण को तेजी से क्यों नहीं हटाना चाहिए ताकि उसका दुरुपयोग न हो या अतिक्रमण को हटाया न जाए।

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