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हिंदी हैं हम : राष्ट्रभाषा कराती है अपनत्व का अहसास, संवाद और संपर्क का है सूत्र
Sun, 15 Aug 2021 06:20 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sun, 15 Aug 2021 06:20 AM IST
सार
दिल्ली पुलिस में वरिष्ठ पदों पर तैनात अधिकारियों ने हिंदी को लेकर साझा किए विचार
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अंटो अल्फांस, सुबोध कुमार गोस्वामी और सतबीर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
आम बोल चाल की भाषा होने के साथ हिंदी शासनिक व प्रशासनिक संचार का अहम माध्यम भी है। दिल्ली पुलिस भी इसका अपवाद नहीं। देश के हर हिस्से से आने वाले कनिष्ठ से वरिष्ठ अधिकारी तक हिंदी को आज की जरूरत मानते हैं। किसी भी मामले की तफ्तीश तक पहुंचना हो या फिर लोगों के बीच सुरक्षा को लेकर विश्वास स्थापित करना हो, हिंदी को संवाद के लिए प्रमुख तौर पर बोला व पढ़ा जाता है।
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भारत की राजधानी दिल्ली में संवाद के लिए हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी का सर्वाधिक प्रयोग होता है, जो बेहतर संवाद में भी मदद करता है। मैं मूलरूप से तमिलनाडु से ताल्लुक रखता हूं। दिल्ली में तैनाती की शुरुआत में हिंदी बोलने और समझने में थोड़ी दिक्कत हुई, लेकिन धीरे-धीरे हिंदी से जुड़ाव होता गया। वरिष्ठ अधिकारियों और कनिष्ठ कर्मचारियों से हिंदी में बातचीत के दौरान मेरी हिंदी में समग्र सुधार हुआ और हिंदी बोलने का आत्मविश्वास भी आया। अब मैं पूरी तरह से हिंदी बोलने में सक्षम हूं और प्रमुख तौर पर हिंदी में ही बात करना पसंद करता हूं। हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा है और संवाद में इसका प्रयोग करने से मेरे अधीनस्थों के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने में मदद मिलती है। यदि काम के दौरान मुझे हिंदी का कोई नया शब्द पता चलता है तो उसके अर्थ व प्रयोग को समझता हूं। यही नहीं अन्य पुलिसकर्मियों को भी हिंदी में वार्तालाप करने के लिए प्रेरित करता हूं। इस भाषा में अपनापन महसूस होने लगा है।
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-अंटो अल्फांस, पुलिस उपायुक्त, उत्तरी जिला
हिंदी आपस में संपर्क की भाषा है। यह सिर्फ भाषा नहीं है बल्कि इससे भावनाएं जुड़ी हुई हैं। हम आज अपने देश में ही अपने लोगों से हिंदी में बात नहीं करते हैं। पुलिस की तैनाती के दौरान मैं दक्षिण भारत में रहा हूं। वहां क्षेत्रीय स्तर पर अपनी भाषा है, लेकिन अपनापन सिर्फ हिंदी में ही महसूस होता है। देश में लोग अलग-अलग धर्मों से हैं, लेकिन सभी लोग हिंदी से जुड़े हुए हैं। क्योंकि, भाषा से ही अपनापन महसूस होता है और हिंदी इस अहसास में सबसे ऊपर है। हिंदी को रोजगार की भाषा भी बनानी चाहिए। आज हिंदी में कम किताबें पढ़ी व लिखी जाती है। यह पूरे राष्ट्र को एक साथ जोड़ने वाली भाषा है। वहीं, हिंदी कई भाषाओं की उत्तराधिकारी भी है। मेरा मानना है कि हिंदी सिर्फ हिंदी दिवस तक ही नहीं सिमटनी चाहिए, बल्कि हर दिन हिंदी का होना चाहिए। तकनीक की भाषा में भी हिंदी आगे होनी चाहिए।
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-सुबोध कुमार गोस्वामी, पश्चिमी जिला अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त
मैं दिल्ली पुलिस की हिंदी पत्रिका दिल्ली पुलिस समाचार में उप संपादक की जिम्मेदारी निभा रहा हूं। इसके साथ ही पुलिस की ओर से जनता के बीच हिंदी में संवाद स्थापित करना मेरी प्रमुख जिम्मेदारी है। मसौदे से लेकर पत्र तक हिंदी में तैयार किए जाते हैं। पुलिस में बकायदा हिंदी के लिए एक सेल भी स्थापित किया गया है। हिंदी में कई बार कुछ ऐसे शब्दों को इस्तेमाल किया जाता है, जिसे समझने में दिक्कत होती है। हिंदी जितनी सरल होगी उतनी आसानी से इसे आम व्यक्ति समझ सकता है। हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसमें बातचीत के दौरान समाज का हर तबका सहज महसूस करता है। इसका सरल होना बहुत जरूरी है।
-सतबीर सिंह, इंस्पेक्टर, दिल्ली पुलिस