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तब्लीगी जमात केस: विदेशी जमातियों को आश्रय देने वालों पर दर्ज प्राथमिकी रद करने पर मांगा जवाब

Thu, 05 Aug 2021 12:34 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Thu, 05 Aug 2021 12:34 AM IST
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high court seeks response on plea for cancellation of FIR against those who gave shelter of jamatees
नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने कोरोना दिशा-निर्देशों का कथित उल्लंघन कर तब्लीगी जमात कार्यक्रम में शामिल होने आए विदेशी नागरिकों को आश्रय देने वालों पर दर्ज प्राथमिकी और कानूनी कार्यवाही रद्द करने की मांग पर दिल्ली पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने मामले की सुनवाई 12 नवंबर तय कर दी।
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न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता ने पुलिस को यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि प्रत्येक आरोपी की क्या भूमिका है। कोविड़-19 के मद्देनजर जारी निषेधाज्ञा के बाद या उससे पहले आवास की सुविधा दी गई थी।
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अदालत ने दिल्ली सरकार के अधिवक्ता को ये सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि अगली सुनवाई से पहले विस्तृत स्थिति रिपोर्ट दाखिल की जाए। रिपोर्ट में प्रत्येक अभियुक्त की भूमिका का हवाला दिया जाए।
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यह भी स्पष्ट किया जाए कि कथित विदेशी नागरिकों को उसके घर में कब रखा गया था, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अधिसूचना जारी होने के बाद या उससे पहले आरोपी ने आवास की सुविधा दी या नहीं।
फरवरी में पुलिस ने अदालत को बताया था कि तब्लीगी जमात कार्यक्रम में भाग लेने वाले विदेशियों को तय नियमों का उल्लंघन करने वाले कुछ भारतीय नागरिकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इन लोगों ने प्राथमिकी रद्द करने का आग्रह करते हुए कहा है कि लॉकडाउन के कारण यात्रा नहीं करने वालों को उन्होंने शरण दी थी।
याचिकाकर्ता ने कहा उन लोगों ने मात्र इस कारण आश्रय दिया था क्योंकि उन्हें लॉकडाउन के दौरान कहीं नहीं जाना था। पुलिस ने गलत तरीके से यह मामला दर्ज किया है।
पेश याचिकाओं में से कुछ उन लोगों की जिन्होंने जमात में आए विदेशियों को लॉकडाउन लगने के कारण शरण दी थी। वहीं कुछ याचिकाएं चांदनी महल इलाके में स्थित मस्जिदों के मैनेजिंग कमेटी सदस्यों और देखभाल करने वालों की ओर से दायर की गई है।
विदेशी महिला जमातियों को शरण देने के आरोपी फिरोज और रिजवान ने अधिवक्ता आशिमा मंडला और मंदाकिनी सिंह के जरिये दायर याचिका में कहा कि उन्होंने उन चार महिलाओं को केवल इसलिए शरण दी क्योंकि वे लॉकडाउन के दौरान कहीं नहीं जा सकती थीं।

इसके अलावा उन्होंने और अन्य याचिकाकर्ताओं ने ये तर्क भी दिया कि एफआईआर या आरोपपत्र में ऐसा दस्तावेज या साक्ष्य नहीं है कि वे कोरोना से संक्रमित हुए थे। इसलिए उन्हें महामारी अधिनियम के तहत महामारी फैलाने का आरोपी नहीं बनाया जा सकता था।
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