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सीवर की मैन्युअल सफाई में होने वाली मौतों पर केंद्र से जवाब तलब

Fri, 06 Aug 2021 12:52 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Fri, 06 Aug 2021 12:52 AM IST
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high court seeks response from center over the deaths during manual scavanging
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने सीवर और सेप्टिक टैंकों की मैन्युअल सफाई के कारण होने वाली मौतों व हाथ से मैला ढोने की प्रक्रिया रोकने के लिए 2013 में बने कानून का कड़ाई से पालन करने के मुद्दे पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याची ने राज्यसभा के 254वें सत्र के दौरान सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले के हालिया बयान का हवाला देते हुए केंद्र को पक्ष बनाने का आग्रह किया था। उन्होंने बयान में कहा था कि पिछले पांच साल में हाथ से मैला ढोने के कारण कोई मौत नहीं हुई है।
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मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल व न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को याचिका में उठाए गए सवालों पर अपना पक्ष रखने का निर्देश देते हुए सुनवाई 13 सितंबर तय कर दी। सामाजिक कार्यकर्ता एवं याची अधिवक्ता अमित साहनी ने पीठ के समक्ष तर्क रखा कि राज्यमंत्री का संसद में दिया गया बयान स्थिति के विपरीत है।
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उन्होंने कहा संसद के उच्च सदन के समक्ष राज्यमंत्री द्वारा दिया गया जवाब न केवल झूठा और भ्रामक है बल्कि हाथ से मैला ढोने वालों, उनके परिवारों और अन्य लोगों की दिवंगत आत्माओं के प्रति घोर संवेदनहीनता और उदासीनता को दर्शाता है जो अभी भी इस काम में हैं।
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याची ने कहा कि संबंधित मंत्रालय ने इस वर्ष फरवरी में यह कहा था कि पिछले पांच वर्षों के दौरान हाथ से मैन्युअल सफाई करने व मैला ढोने वाले 340 लोगों की मौतें हुई हैं जो उच्च सदन में उठाए गए अतारांकित प्रश्न का विपरीत है।
याची अमित साहनी ने अपनी मुख्य याचिका में दिल्ली सरकार को हाथ से मैला ढोने वालों के हित में 2013 कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग करते हुए दायर की थी। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार रोजगार निषेध की नीति को हाथ से मैला ढोने वाले और उनके पुनर्वास अधिनियम 2013 के रूप में बनाने और इसके कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार है।
हाईकोर्ट ने इससे पहले मामले में दिल्ली सरकार के अलावा तीनों नगर निगम, दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली छावनी बोर्ड और लोक निर्माण विभाग को याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। अब मामले में केंद्र सरकार भी पक्ष बन गई।

हाथ से मैला ढोने वालों के पुनर्वास से संबंधित 2007 की एक अन्य याचिका भी उच्च न्यायालय में लंबित है जिसने इस तरह की प्रथा पर रोक लगाने वाले कानून के बावजूद शहर में हाथ से मैला ढोने के अस्तित्व को शर्मनाक करार दिया है।
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