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मुंडका में मातम : दिनभर तलाशती रहीं निगाहें...मगर वो न आए, कशमकश और उम्मीद में बिलखते रहे परिजन
Sun, 15 May 2022 06:03 AM IST
दुष्यंत शर्मा
किशन कुमार, नई दिल्ली
किशन कुमार, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sun, 15 May 2022 06:03 AM IST
सार
तीमारदारों के परिजन कृपया ध्यान दें... मुंडका की इमारत में लगी आग बुझ गई है। यदि आपके परिजन भी घटना में शामिल थे तो कृपया अस्पताल प्रशासन को सूचना दें। संजय गांधी अस्पताल में बार-बार की जा रही यह उद्घोषणा कुछ देर के लिए चुप्पी पैदा कर देती थी, लेकिन इसके अगले पल ही परिजनों की चीख-पुकार खामोशी को तोड़ रही थी। रोते-बिलखते परिजनों की आंखों में आंसू अपनों की तलाश में मोर्चरी के दरवाजे पर बार-बार बहते और सूखते रहे। मुंडका इलाके की इमारत में लगी आग में लापता लोगों के परिजन शुक्रवार देर रात से ही अस्पताल में पहुंचना शुरू हो गए थे। कोई फोन तो कोई हाथों में फोटो लेकर दिनभर अपने पि्रयजनों को ढूंढते रहे। संजय गांधी अस्पताल में चिलचिलाती धूप में रोते-बिलखते रहे परिजन।
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Delhi Mundka Fire
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
शनिवार को सुबह तक संजय गांधी अस्पताल में बड़ी संख्या में परिजनों की भीड़ पहुंच गई थी। अधिक भीड़ को देखते हुए अस्पताल में वॉलंटियर व दिल्ली पुलिस के जवानों को तैनात किया गया था। इस बीच अस्पताल प्रशासन की ओर से बार-बार मुंडका इलाके की घटना को लेकर उद्घोषणा की जा रही थी। पीड़ितों के परिजनों के परिजनों के लिए अस्पताल में एक हेल्प डेस्क भी बनाया गया था, जहां घायलों का सूची में नाम जोड़ा जा रहा था।
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फूट-फूटकर रोते नजर आए पीड़ित
घटना के बाद से गायब अपने परिजनों की तलाश में संजय गांधी अस्पताल में दिनभर परिजन चिलचिलाती धूप में अपनों को ढूंढते रहे। कोई फोन तो कोई हाथों में पासपोर्ट साइज फोटो लेकर पुलिस व अस्पताल प्रशासन के आगे गिड़गिड़ाता रहा। आंखों में आंसू लिए बस एक ही इच्छा थी कि अपने मिल जाए। इस बीच परिजनों को सांत्वना देने के लिए उनके पड़ोस में रहने वाले लोग भी फूट-फूटकर रोते हुए नजर आए।
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मेरी बेटी पूजा को मुुझसे मिला दो
मोर्चरी के पास रो रही मां अपनी बेटी पूजा को तलाश करती दिखी। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी इमारत में सीसीटीवी पैक करने का काम करती थी। घटना की जानकारी रात 9 बजे मिली, जिसके बाद अस्पताल की मोर्चरी में ही हूं। मेरी बेटी के आंख के नीचे कट का निशान है।
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इमारत से कूदी थी बेटी, अभी तक पता नहीं
बिहार के पटना से पहुंची मां सिल्लु देवी भी रोते हुए अपनी बेटी स्वीटी को ढूंढते हुए दिल्ली के अस्पतालों में धक्के खाते हुए संजय गांधी अस्पताल की मोर्चरी में पहुंची, लेकिन उन्हें बेटी का कुछ पता नहीं चला। सिल्लु ने कहा कि उसकी सहेली इमारत का शीशा तोड़कर कूद गई थी, जिसके बाद स्वीटी को कूदने के लिए कहा। बेटी हिम्मत करने के बाद इमारत से कूद गई थी और कमर की चोट से घायल हो गई थी। घटना की सूचना मिलते ही बिहार से दिल्ली पहुंची हूं, लेकिन अब यहां बेटी को लेकर कोई भी जानकारी नहीं दे रहा है। नेता व अधिकारी एक-दूसरे को जवाबदेही बना रहे हैं।
आशा के परिवार के तीन लोग इमारत में काम करते थे
मौके पर पहुंची आशा ने बताया कि उसकी बेटी मधु सुबह इमारत में काम करने आई थी। किसी ने फोन कर इमारत में आग लगने के बारे में बताया। इसके बाद उसने बेटी को कई फोन किए, मगर बेटी का फोन नहीं लग रहा था। आशा ने आगे बताया कि उसकी बहन की बेटी प्रीति व पूनम वहां पैकिंग का काम करती थी। उन दोनों का भी पता नहीं लग रहा है।
पहले दिन ही मिला था पहला वेतन...
अजीत तिवारी ने बताया कि उनकी बहन मोनिका को बीते बृहस्पतिवार को ही पहला वेतन मिला था। हमें शाम 5 बजे जानकारी मिली की इमारत में आग लग गई है, लेकिन यह नहीं पता था कि आग मोनिका वाली इमारत में लगी है। जब बहन शाम 7 बजे तक नहीं लौटी तो परिवार ने तलाश शुरू की, लेकिन अभी तक कुछ पता नहीं चला। गोंडा निवासी मोनिका अपने दो भाइयों के साथ आया नगर इलाके में रहती थी।
बेटे की खाितर मां का बुरा हाल
अपने बेटे की तलाश में राजरानी अन्य पीड़ित परिवार की तरह गुमसुम नजर आई। अस्पताल का एक कोना पकड़कर बैठी मां अपने बेटे से मिलने के लिए बार-बार रोती हुई नजर आई। राजरानी ने कहा कि बेटा नरेंद्र दो साल से फैक्टरी में कैमरे पैक करने का काम करता था। बेटे ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा था, लेकिन इसके बाद भी बेटे का कुछ पता नहीं चल रहा है। डॉक्टर कह रहे हैं कि डीएनए जांच के बाद ही शवों का शिनाख्त हो सकेगी।
...कैसे करें तलाश, इकलौती कमाने वाली थी निशा
निशा की माता शनिवार को दिनभर रोते बिलखते हुए अपने बेटी की तस्वीर लिए इधर-उधर भटकती हुई नजर आई। माता मीरा देवी ने बताया कि छह बेटियों व एक बेटे में निशा इकलौती कमाने वाली बेटी थी। आठ घंटे की नौकरी कर घर का खर्च चलाती थी और परिवार की जरूरतें पूरा करती थी। इमारत की आग ने मेरी बेटी को मुझसे अलग कर दिया है। न ही डॉक्टर कुछ बता रहे हैं और न ही पुलिस कुछ कह रही है।
तीन बहनें भी हैं लापता
घटना में एक ही परिवार की तीन बहनें भी लापता हैं। बेटियों की तलाश करते हुए महिपाल और राकेश दोनों भाई दिनभर धूप में संजय गांधी अस्पताल की मोर्चरी से आंबेडकर और सफदरजंग अस्पताल में चक्कर काटते रहे। महिपाल की दोनों बेटियां प्रीति और पूनम इमारत की एक ही मंजिल पर सीसीटीवी कैमरा पैक करने का काम करती थी। वहीं, चचेरी बहन मधु भी इसी इमारत में काम करती थीं। मूलरूप से अलीगढ़ के अतरौली तहसील में जामना गांव के रहना वाला परिवार कई वर्षों से मुबारकपुर डबास में रहते हैं। परिजनों ने बताया कि शाम 4 बजे आखिरी बार बेटियों से बात हुई थी।
सालगिरह पर दिया था कड़ा, शिनाख्त में मिली मदद
इमारत में बीते 10 वर्षों से मोहिनी भी काम करती थी। वर्तमान में वह सेल्स मैनेजर के तौर पर काम कर रही थीं। मोहिनी के पड़ोसी आकाश ने बताया कि मोहिनी के पति विजय पाल एक निजी एयरलाइंस में कार्यरत हैं। विजय ने हाल ही में शादी की सालगिरह पर पत्नी को कड़ा दिया था। इसी के आधार पर मोर्चरी में शव की पहचान हो सकी।
खुशनसीब रहीं प्रियंका और पूनम, काम पर जाती तो जाने क्या होता...
मुंडका की जिस इमारत में हादसा हुआ, वहां काम करने वाले कुछ लोग खुशनसीब भी रहे। किसी न किसी कारण शुक्रवार को इन लोगों ने काम से छुट्टी कर ली और यह हादसे का शिकार होने से बच गए। यहां काम करने वाली अगर नगर की रहने वाली प्रियंका और घेवरा निवासी पूनम भी खुशनसीब रही। प्रियंका के पति की अचानक तबीयत खराब हो गई तो पूनम का भी स्वास्थ्य बिगड़ गया। इस वजह से दोनों ही उस दिन काम पर नहीं जा सकी और हादसे का शिकार होने से बच गई। दोनों भगवान का शुक्र अदा करते नहीं थक रहीं।
दोनों ने बताया कि फैक्टरी मालिक उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर बेहद कम सैलरी पर उनको काम करने के लिए मजबूर कर रहा है। प्रियंका ने बताया कि पिछले करीब एक साल से प्रियंका यहां पर सात हजार रुपये महीना की सैलरी पर काम करती थी। शुक्रवार सुबह वह काम पर जाने के लिए तैयार भी हो गई, लेकिन अचानक उसके पति की तबीयत खराब हो गई। प्रियंका वापस आ गई। इसके बाद उसके पति ने उसे काम पर जाने नहीं दिया।
खुदा ने बचा ली जान...
जिंदगी और मौत देने वाला मेरा खुदा है, अल्लाह ने ही बस मेरी जान बचा ली, मैंने तो जिंदगी की आस ही छोड़ दी थी...। हादसे में बाल-बाल बची शाजिया परवीन खुदा का शुक्र अदा करते नहीं थक रही थी। हादसे के समय वह दूसरी मंजिल पर मौजूद थी। आग लगी तो अंदर अफरातफरी मच गई। हालांकि, उसके हाथ झुलस गए। वह परिवार के साथ मुकर्रबा चौक इलाके में रहती है।