किसान नेताओं ने देश से किया आंदोलन में सहयोग देने का आह्वान, बोले- यह जीविका बचाने की लड़ाई
नए कृषि कानून के विरोध में दिल्ली की सीमा पर डटे किसानों के आंदोलन को ढाई महीने से ज्यादा का समय बीत गया है। हर नए दिन के साथ किसानों की संख्या में इजाफा हो रहा है। शनिवार को गाजीपुर बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा के सभी पदाधिकारियों ने किसान एकता का संदेश दिया। मोर्चे के नेताओं ने कहा कि यह आंदोलन जीविका बचाने की लड़ाई है। वह अपनी आखिरी सांस तक संघर्ष करते रहेंगे। मंच से अपने संबोधन में किसान नेताओं ने केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा।
किसान आंदोलन को मजबूती देने के लिए शनिवार को गाजीपुर बॉर्डर पर शनिवार को संयुक्त किसान मोर्चे की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता डॉ. दर्शनपाल, भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत, भाकियू हरियाणा के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी, किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल और युद्धवीर सिंह पहुंचे। सभी किसान नेताओं ने एक स्वर में केंद्र सरकार से तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की।
मंच से 14 फरवरी को देशभर में कैंडल मार्च निकालने, 16 फरवरी को सर छोटूराम की याद में समारोह मनाने और 18 फरवरी को दोपहर 12 बजे से चार बजे तक रेलगाड़ियों के चक्काजाम करने का एलान किया। इसमें सभी लोगों को शामिल होने के लिए कहा गया है। अपने संबोधन में डॉ. दर्शन पाल ने कहा कि दिल्ली की सभी सीमाओं पर इस समय किसानों का हुजूम है। राजधानी के आसपास के कई राज्यों में महा पंचायतों का दौर चल रहा है। इनके जरिए देश के लोगों को कृषि कानूनों से होने वाले नुकसान के विषय में जागरूक किया जा रहा है।
दर्शनपाल ने कहा कि किसान मोर्चा की 5 मांगे हैं, जिनको सरकार को पूरा करना होगा। इनमें तीनों कृषि कानूनों को वापस लेना, न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना, दिल्ली-एनसीआर में लागू पराली से संबंधित नियम में बदलाव करना और किसानों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेना शामिल है। उन्होंने कहा कि किसान मोर्चा देश के अन्नदाता के हक के लिए संघर्ष कर रहा है यह आजीविका बचाने की लड़ाई है। देश के सभी लोगों को एक साथ मिलकर इसे लड़ना होगा।
प्रधानमंत्री के बयान से आहत
किसान नेता बलवीर सिंह राजेवाल ने कहा कि जिस तरह लोकसभा और राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शब्दों का इस्तेमाल किया है, वह उनसे यह उम्मीद नहीं करते थे। एक तरफ वह किसान को अन्नदाता बोल रहे हैं और दूसरी तरफ किसानों को परजीवी कह रहे हैं। किसान किसी कीमत पर इन शब्दों को भूल नहीं पाएंगे। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार खेती-बाड़ी को भी कॉर्पोरेट घरानों के हाथ में देना चाहती है। लेकिन इस देश का किसान ऐसा नहीं होने देगा।
केंद्र सरकार पर साधा निशाना
किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि सरकार पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली बन गई है। सभी चीजों का निजीकरण किया जा रहा।। कुछ पूंजीपति मिलकर सरकार चला रहे। अगर कानून वापस नहीं दिए गए तो किसानों का जीवन बर्बाद हो जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार अन्नदाता के सब्र का इम्तिहान ले रही है। आंदोलन इसी प्रकार शांतिपूर्वक चलता रहेगा। किसान न तो पुलिस से उलझेगा न ही प्रशासन से, लेकिन अगर किसानों के गांव में भाजपा का कोई भी नेता वोट मांगने आएगा तो उसका विरोध किया जाएगा।
आंदोलन पूरे देश का है
भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि किसान आंदोलन केवल एक राज्य का नहीं बल्कि पूरे देश का आंदोलन है। कर्नाटक और तमिलनाडु के किसान भी आंदोलन का हिस्सा बन रहे हैं। गुजरात के किसान भी भाग लेना चाहते हैं लेकिन उन्हें जेल में डाला जाता है। टिकैत ने कहा कि सरकार लग रहा है कि गर्मियों के मौसम में किसान दिल्ली की सीमाओं को छोड़कर चले जाएंगे। लेकिन, ऐसा नहीं होगा। आने वाले दिनों में बॉर्डर पर टेंट की व्यवस्था की जाएगी और पंखे भी लगाए जाएंगे। अगर प्रशासन ने बिजली की सुविधा नहीं दी तो जनरेटर से काम चलाएंगे।