दिल्ली: साफ हवा के लिए हजारों करोड़ का पर्यावरण टैक्स चुकाते हैं दिल्ली वाले, बदले में मिला दम घोंटने वाला धुआं
राजधानी में पर्यावरण का मुद्दा बेहद पुराना है। समय-समय पर सर्वोच्च अदालत ने इस पर अपनी टिप्पणी की है और पर्यावरण सुधार के लिए अनेक उपाय भी सुझाए हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पर्यावरण को साफ रखने के लिए सरकारें कोई ठोस कार्रवाई करें या नहीं, लेकिन इसके नाम पर टैक्स लेने से वे कभी नहीं चूकती हैं। दिल्लीवासी पर्यावरण के नाम पर दिल्ली सरकार को पिछले सात सालों में करीब साढ़े चौदह सौ करोड़ का टैक्स दे चुके हैं, लेकिन इसके बदले में उन्हें केवल दम घोंटने वाला प्रदूषण ही मिला है। हवा को साफ रखने के सरकार के कोई प्रयास अब तक कारगर साबित नहीं हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद शायद केंद्र और दिल्ली की एजेंसियों की नींद टूटे और वे कोई ठोस कार्रवाई करें, हालांकि पर्यावरण के प्रति उनका रवैया लोगों को बहुत आश्वस्त करता नहीं दिखता है।
एक आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, दिल्ली सरकार ने पर्यावरण टैक्स के रूप में पिछले सात सालों में कुल 1439.65 करोड़ रूपयों की वसूली की है। ये टैक्स वाहनों की खरीद, दिल्ली में बाहर से आने वाले वाहनों से टैक्स के रूप में, पेट्रो उत्पादों की बिक्री से और राजधानी में चल रही निर्माण इकाइयों से लिया जाता है। नियमों के अनुसार इसका उपयोग पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए किया जाना चाहिए।
सरकार बताए पैसा कहां खर्च हुआ
दिल्ली भाजपा नेता हरीश खुराना ने अमर उजाला से कहा कि ये आंकड़े आरटीआई से मिले हैं। सरकार ने बीते सात सालों में हजारों करोड़ का पर्यावरण टैक्स वसूला है। सरकार ने दिल्ली विधानसभा में स्वयं भी इसकी जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि इस धन का उपयोग प्रदूषण को कम करने के लिए किया जाना चाहिए था, लेकिन दिल्ली के प्रदूषण को देखते हुए यह समझ आता है कि सरकार ने सात सालों में पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं किया है। उन्होंने कहा कि सरकार को यह बताना चाहिए कि उसने इस धन को कहां और कैसे खर्च किया?
पर्यावरण का मुद्दा बहुत पुराना
राजधानी में पर्यावरण का मुद्दा बेहद पुराना है। समय-समय पर सर्वोच्च अदालत ने इस पर अपनी टिप्पणी की है और पर्यावरण सुधार के लिए अनेक उपाय भी सुझाए हैं। दिल्ली में कांग्रेस सरकार के दौरान अजय माकन के परिवहन मंत्री रहते हुए राजधानी में वाहनों को सीएनजी आधारित करने का प्रस्ताव लाया गया। माना गया था कि यह उपाय राजधानी को वाहनों के प्रदूषण से निजात देगा और लोगों को साफ हवा मिल सकेगी।
इसका असर हुआ भी और वाहनों के प्रदूषण में अच्छी खासी कमी दर्ज की गई। लेकिन राजधानी की भारी आबादी और लगातार निकलते नए वाहनों के कारण यह उपाय प्रदूषण को कम करने में नाकाफी साबित हुआ।
इसका सबसे बड़ा कारण यह बताया गया कि राजधानी के वाहनों से प्रदूषण कम हो रहा है, लेकिन दिल्ली की सीमा में रोजाना बाहरी राज्यों से आने वाले डीजल वाहनों से भारी मात्रा में प्रदूषण पैदा होता है। इसे देखते हुए 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने बाहर से आने वाले वाहनों से पर्यावरण टैक्स वसूलने का सुझाव दिया था। इसके बाद से राजधानी में बाहर से आ रहे वाहनों पर टैक्स के रूप में पर्यावरण टैक्स लिया जाता है। इस धन का उपयोग राजधानी में सार्वजनिक वाहनों को बढ़ावा देने, प्रदूषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और प्रदूषण को कम करने के विभिन्न उपायों में किया जाना था।
इस दौरान दिल्ली सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए कई दावे किये हैं। इनमें स्मॉग टावर लगाना, राजधानी में हरित क्षेत्र बढाना, निर्माण इकाइयों पर धूल नियंत्रण के प्रभावी उपाय लागू करने के लिए बाध्य करना, सड़कों पर जल का छिड़काव कर धूल प्रदूषण को कम करना, सीएनजी आधारित और ई-वाहनों को बढ़ावा देना शामिल है। लेकिन विपक्ष का दावा है कि सरकार के ये सारे दावे कागजी हैं और प्रचार के अलावा जमीन पर कोई काम नहीं हो रहा है जिसका परिणाम है कि राजधानी में होने वाला प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है।