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दिल्ली: महरोली स्थित कुतुब मीनार में 27 मंदिरों की बहाली मुद्दा, संस्कृति मंत्रालय, एएसआई डीजी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा

Tue, 22 Feb 2022 07:31 PM IST
अनुराग सक्सेना अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: अनुराग सक्सेना Updated Tue, 22 Feb 2022 07:31 PM IST
सार

याचिका में आरोप लगाया गया है कि 1198 में मुगल सम्राट कुतुब-दीन-ऐबक के शासन में लगभग 27 हिंदू और जैन मंदिरों को अपवित्र और क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। उन मंदिरों के स्थान पर उक्त मस्जिद का निर्माण किया गया था।

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Delhi: The issue of restoration of 27 temples in Qutub Minar located in Mehroli, Ministry of Culture, issued notice to ASI DG, seeking response
कुतुब मीनार - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

अदालत ने मंगलवार को जैन देवता तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव और हिंदू देवता भगवान विष्णु की ओर से दायर अपील पर संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के महानिदेशक और अधीक्षण पुरातत्व दिल्ली सर्कल, एएसआई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अपील में सिविल जज के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसमें महरोली स्थित कुतुब मीनार में 27 मंदिरों की बहाली की मांग खारिज कर दी थी।

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याची ने आरोप लगाया है कि मीनार के भीतर स्थित कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद महरौली में मीनार परिसर एक मंदिर परिसर के स्थान पर बनाया गया था और मंदिर परिसर की बहाली की जानी चाहिए जिसमें 27 मंदिर शामिल थे। साकेत न्यायालय की अतिरिक्त जिला न्यायाधीश पूजा तलवार ने मामले की अगली सुनवाई 11 मई की तिथि निर्धारित करते हुए अपील स्वीकार कर ली।

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सिविल जज नेहा शर्मा ने यह देखते हुए दीवानी वाद को खारिज कर दिया था कि वाद को पूजा स्थल अधिनियम 1991 के प्रावधानों द्वारा वर्जित किया गया था और गैर-प्रकटीकरण के लिए सिविल प्रक्त्रिस्या संहिता के आदेश 7 नियम 11 (ए) के तहत वादी को खारिज कर दिया गया था।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि 1198 में मुगल सम्राट कुतुब-दीन-ऐबक के शासन में लगभग 27 हिंदू और जैन मंदिरों को अपवित्र और क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। उन मंदिरों के स्थान पर उक्त मस्जिद का निर्माण किया गया था।

याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा था कि अतीत की गलतियां वर्तमान शांति को भंग करने का आधार नहीं हो सकती हैं। भारत का सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इतिहास था। इस पर कई राजवंशों का शासन रहा है। तर्कों के दौरान, वादी के वकील ने राष्ट्रीय शर्म के मुद्दे पर जोरदार तर्क दिया है। हालांकि, किसी ने भी इनकार नहीं किया है कि अतीत में गलतियां की गई थीं, लेकिन इस तरह के गलतियां हमारे वर्तमान और भविष्य की शांति भंग करने का आधार नहीं हो सकतीं।

सिविल जज ने कहा था कि सरकार द्वारा किसी स्मारक को संरक्षित घोषित कर दिए जाने के बाद वादी इस बात पर जोर नहीं दे सकते कि इसका उपयोग अन्य उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा था कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के उद्देश्य को लागू करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए और इसका उद्देश्य राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखना है। हमारे देश का एक समृद्ध इतिहास रहा है और इसने चुनौतीपूर्ण समय देखा है। फिर भी इतिहास को समग्र रूप से स्वीकार करना होगा। क्या हमारे इतिहास से अच्छे को बरकरार रखा जा सकता है और बुरे को मिटाया जा सकता है? इस प्रकार, पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के पीछे के उद्देश्य को पूरी ताकत देने के लिए दोनों विधियों की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या की आवश्यकता है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि मोहम्मद गौरी के कमांडर कुतुबदीन ऐबक ने विष्णु हरि मंदिर और 27 जैन और हिंदू मंदिरों को संबंधित देवताओं के साथ ध्वस्त कर दिया और मंदिर परिसर के भीतर कुछ आंतरिक निर्माण किए। मंदिर परिसर का नाम बदलकर कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद कर दिया गया।

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