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अब भी कम नहीं है प्रवासियों का दर्द, धैर्य देने लगा है जवाब
Sun, 09 May 2021 05:23 AM IST
दुष्यंत शर्मा
आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली
आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sun, 09 May 2021 05:23 AM IST
सार
- ज्यादातर हो गए हैं बेरोजगार, धीरे-धीरे निकल रहे अपने गृह जनपद
- किसी के पास रोजगार भी है तो उसके पास ग्राहक नहीं
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कोरोना का दंश...
- फोटो : ANI
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विस्तार
राजधानी में कोरोना का कहर जारी है। बेकाबू हालात से सरकार और आम नागरिक दोनों जूझ रहे हैं। समझ में नहीं आ रहा कि कब तक भयावह हालात का सामना करना पड़ेगा। शहर में जरूरी सेवाएं छोड़कर बाकी कामकाज 18 दिन से बंद हैं। कमोवेश, पिछले साल जैसा शहर में लॉकडाउन है। यह कब खत्म होगा? सरकार तय कर पाने की स्थिति में नहीं है। दूसरे राज्यों से आकर दिल्ली में नौकरीपेशा, मजदूरी करने वाले लोगों का धैर्य भी जवाब देने लगा है। जिनके हाथ में काम है, उन्हें छोड़कर बाकी मजदूर धीरे-धीरे अपने गांव की तरफ निकल रहे हैं।
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दिल्ली में होटल रेस्तरां खुले हैं और होम डिलीवरी से लोगों को खाना पहुंच रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि रेस्तरां की सेल नहीं के बराबर है। नॉर्थ-वेस्ट दिल्ली के एनएसपी में स्थित फेमस रेस्तरां फूड प्वाइंट के मालिक सुशील कुमार ने बताया कि उनके यहां 30 लोगों को बैठाकर खिलाने की जगह है। रेस्तरां में बैठाकर खिलाने की छूट नहीं है, ऑनलाइन ऑर्डर भी नहीं आ रहे हैं। इसलिए कुछ दिनों के लिए उन्होंने अपना रेस्तरां बंद कर दिया है। उनके यहां 15 मजदूर काम करते हैं। सबको छुट्टी दे रखी है और उन्होंनेे सोचा है कि जब तक सब ठीक नहीं हो जाता इसे बंद रखेंगे। यहां हजारों दुकानें, निजी कार्यालय हैं, मौजूदा समय सब बंद हैं।
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पहले दिन से शुरू हुआ था पलायन
कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप शुरू हुआ तो दिल्ली सरकार ने 20 अप्रैल से हफ्तेभर का लॉकडाउन लगाया। प्रवासी मजदूरों को तभी से भय सताने लगा था कि यदि लॉकडाउन बढ़ा या संपूर्ण लॉकडाउन लगा तो वह फंस जाएंगे। इसलिए उन्होंने अपना सामान बांधना चालू कर दिया। पहले दिन ही बड़ी संख्या में मजदूर गांव की तरफ चल दिए थे। यूपी में पंचायत चुनाव में हिस्सा लेने गए बड़ी संख्या में लोग गांव में ही रुक गए। अभी भी लोगों के जाने का सिलसिला जारी है।
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दिल्ली-नोएडा बॉर्डर पर दिखता है दर्द
प्रवासी मजदूरों के पलायन की स्थिति पिछले साल जैसी ही दर्दनाक है, दिल्ली-नोएडा बॉर्डर पर यह दर्द साफ नजर आता है। यहां घंटे भर रुककर देखिए तो ना जाने कितने लोग छोटे बच्चों और महिलाओं के साथ पैदल जाते नजर आते हैं। देर रात तक पैदल जाने वालों का सिलसिला जारी रहता है। यूपी, बिहार जाने वाली बसों में भरकर लोग यहां से जाते नजर आते हैं।
ठीक होने पर ही लौटेंगे
नोएडा गेट पर परिवार के साथ पैदल जाते रमाकांत ने बताया कि उन्हें नोएडा से गांव के लिए बस मिलेगी। इंडिया गेट और आसपास दूसरे पर्यटक स्थलों पर वह आइसक्रीम बेचते हैं। 15 दिन से वह किसी तरह दिल्ली में पड़े थे, लेकिन मजबूरन उन्हें गांव जाना पड़ा। उन्होंने कहा कि पेट पालने और बच्चों की परवरिश करने के लिए उन्हें फिर यहां लौटना पड़ेगा। जब सब कुछ ठीक हो जाएगा।
केस 01 : कमरे में खाली बैठकर कैसे दें किराया
राजस्थान के रहने वाले किशन एनएसपी में एक फेमस रामजी स्नैक्स के यहां काम करते हैं। उन्होंने बताया कि 15 दिन से काम बंद है। वह सोच रहे हैं अब अपने गांव निकल जाएं। पिछले साल लॉकडाउन में उन्होंने दिल्ली में कई महीने एक छोटे से कमरे में बिताए थे। इस बार वह ऐसे नहीं रहना चाहते हैं। शकूरपुर में उन्होंने किराए पर कमरा ले रखा है, उसका भाड़ा भरना पड़ रहा है। वह बैठकर उसका किराया नहीं चुका पाएंगे।
केस 02 : आखिर कर्मचारियों को कब तक बैठाकर खिलाएंगे
मयूर विहार में नेहना राम, उनके भाई साहेब व परिवार के और दो-तीन लोग मिलकर रेस्तरां चलाते हैं। वहां काम करने वाले कर्मचारी भी भरतपुर, राजस्थान स्थित उनके गांव के हैं। इन्हें साथ में लेकर वह चिल्ला में रहते हैं। यहां पर उन्होंने किराए पर रहने के लिए घर, दुकान और छोटा गोदाम ले रखा है। हर महीने दुकान का किराया 40 हजार रुपया चुकाना पड़ रहा है। नेहना राम ने बताया कि 15 दिन से वह अपने गांव से आए मजदूरों को गोदाम में बैठाकर खिला रहे हैं। अब धैर्य जवाब दे रहा है, हफ्ते भर बाद वह सबको गांव जाने के लिए बोल देंगे। इससे पहले उन्होंने कई महीने बंद दुकान का किराया भरा है। अब उनकी ताकत जवाब देने लगी है।
केस 03 : लंगर में खाकर पार्किंग में सोते हैं
मयूर विहार फेज-1 की एक पार्किंग में सिवान के चंद्र प्रकाश और उनके आधा दर्जन साथी रह रहे हैं। कोई ई-रिक्शा चलाता है, किसी के पास ऑटो रिक्शा है। चंद्र प्रकाश ने बताया कि उनका भाई भी यही रहता है। वह कपड़े की दुकान में काम करता है। फिलहाल उसकी दुकान बंद है तो वह घर निकल गया। यहां पर वही लोग रुके हैं, जिनके हाथ में कोई काम है। इन दिनों वह ढूंढकर किसी लंगर में खाना खाते हैं और पार्किंग में ही सो जाते हैं।