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Delhi: जाम में रोज फंसती है दिल्ली, हर साल 60 हजार करोड़ रुपये स्वाहा, दबाव से सड़कें बन रही हैं बॉटलनेक

Sun, 22 Feb 2026 06:36 AM IST
Digvijay Singh सचिन कुमार, अमर उजाला, नई दिल्ली
सचिन कुमार, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Sun, 22 Feb 2026 06:36 AM IST
सार

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कें रोजाना बढ़ती वाहनों की संख्या के चलते बेहद दबाव में हैं। आए दिन जाम से जूझती जनता शहर के लचर ट्रैफिक के लिए पुलिस और सिस्टम को दोष देती है। कई सड़कों पर बॉटलनेक जैसी स्थिति इस मुसीबत को और बढ़ा रही है।

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Delhi is stuck in traffic jams every day 60 000 crore is lost every year and the pressure is turning roads int
जाम में फंसे लोग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कें रोजाना बढ़ती वाहनों की संख्या के चलते बेहद दबाव में हैं। आए दिन जाम से जूझती जनता शहर के लचर ट्रैफिक के लिए पुलिस और सिस्टम को दोष देती है। कई सड़कों पर बॉटलनेक जैसी स्थिति इस मुसीबत को और बढ़ा रही है। इसके चलते दिल्ली वालों के साल में 60 हजार करोड़ रुपये ईधन समेत अन्य कारणों से स्वाहा हो रहे हैं। आर्थिक रूप के कमजोर वर्ग सालाना 7,200 से 19,600 रुपये तक और उच्च-कुशल श्रमिक 25,900 रुपये तक का नुकसान झेल सकते हैं। ये खुलासा दिल्ली शहरी कला आयोग(डीयूएसी) की कुछ समय पहले आई रिपोर्ट से हुआ है। काम के दिन में सुबह वाहनों की औसत गति 41 और शाम को 56 फीसदी तक कम हो जाती है।

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डीयूएसी की रिपोर्ट के अनुसार, नांगलोई डिपो, एस-ब्लॉक मंगोलपुरी, आईटीओ जैसे कई चौराहों पर सड़कें संकरी और अव्यवस्थित हैं। यहां बसें, रिक्शा, पैदल यात्री और निजी वाहन एक साथ चलते हैं, जिससे जाम हमेशा बना रहता है। डीयूएसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि हर साल लगभग 60 हजार करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान जो होता है उसमें समय, ईंधन, प्रदूषण और दुर्घटनाएं शामिल हैं। 
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निजी वाहन का बढ़ता दबाव
सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार, देश में साल 2000 से मोटर वाहन उपयोग में भारी वृद्धि हुई है और हर 5-6 साल में नए वाहनों की संख्या दोगुनी हो जाती है। हालांकि, महामारी के कारण कुछ समय के लिए यह वृद्धि रुक गई, लेकिन अब फिर मोटर वाहन उद्योग में तेजी से सुधार हुआ और 2023-24 में औसतन प्रतिदिन 58,000 नए वाहन पंजीकृत हुए, जिनमें से 52,000 निजी वाहन थे। दिल्ली में इसी अवधि में औसतन 6.4 लाख वाहन पंजीकृत हुए और औसतन प्रतिदिन नए वाहन पंजीकृत हुए, जिनमें से लगभग 1,750 नए वाहन थे। 
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1994 में 27 फीसदी जबकि 2018 में निजी वाहनों की हिस्सेदारी 48.2 प्रतिशत पहुंची 
रिपोर्ट में बताया गया है कि इलेक्ट्रिक वाहन के क्षेत्र में भी काफी प्रगति हुई है और 2015-16 से कुल नए पंजीकरण में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 6.5 फीसदी रही। हालांकि, विदेशी वाहनों के प्रभुत्व से जुड़ी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। दिल्ली में निजी वाहनों की हिस्सेदारी साल 1994 में 27 से बढ़कर 2018 में 48.2 फीसदी हो गई और औसत यात्रा की लंबाई साल 2007 में 6 किलोमीटर से बढ़कर 2018 में 10.9 किलोमीटर हो गई, जो यात्रा की लंबाई में वृद्धि और सड़कों पर बढ़ती निर्भरता दोनों को दर्शाती है।


बॉटलनेक क्यों बन रहे समस्या
डीयूएसी की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में सड़क नेटवर्क बेहद घना है। हर 100 वर्ग किलोमीटर में 1749 किलोमीटर सड़कें हैं, जो देश में सबसे ज्यादा है। इसके बावजूद वाहनों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ गई है कि सड़कें दबाव झेल नहीं पा रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के कई रास्ते बॉटलनेक की वजह से जाम का केंद्र बन चुके हैं। पूसा राउंड अबाउट पर मेट्रो और कोचिंग सेंटरों के कारण ट्रैफिक दबाव बढ़ा है। नांगलोई डिपो में बस, साइकिल रिक्शा और पैदल यात्रियों का टकराव होता है। द्वारका स्थित एनएसजी राउंड अबाउट पर अंडरपास के बाद सड़क अचानक संकरी हो जाती है। मंगोलपुरी के एस ब्लॉक में अस्पताल के पास दुकानें और रिक्शा सड़क घेर लेते हैं। अवैध पार्किंग और अतिक्रमण भी स्थिति और खराब करते हैं। हालिया उदाहरण एआई इंपैक्ट समिट के दौरान वीआईपी मूवमेंट भी रहा, जिसकी वजह से घंटों जाम लगा रहा। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी कंजेशन प्राइसिंग (पीक आवर में चार्ज) की सिफारिश की गई है, जैसे लंदन और सिंगापुर में होता है। 

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