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Delhi News: पुलिस स्टेशन से वर्चुअल साक्ष्य प्रस्तुति पर दिल्ली हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

Wed, 10 Sep 2025 07:31 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Wed, 10 Sep 2025 07:31 PM IST
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Delhi High Court raises questions on virtual evidence presentation from police station
कोर्ट ने कहा कि यह अधिसूचना प्रथम दृष्टया निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत को प्रभावित करती है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को उपराज्यपाल (एलजी) द्वारा जारी उस अधिसूचना पर सवाल उठाए, जिसमें पुलिस अधिकारियों को पुलिस स्टेशनों से वर्चुअल तरीके से अदालतों में साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई है। कोर्ट ने कहा कि यह अधिसूचना प्रथम दृष्टया निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत को प्रभावित करती है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, उपराज्यपाल को निर्दिष्ट स्थान चुनने का अधिकार है, लेकिन सवाल यह है कि विशेष रूप से पुलिस स्टेशनों को ही क्यों चुना गया।
खंडपीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा से कहा, निष्पक्ष सुनवाई क्या है? क्या अभियुक्त की निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार इस अधिसूचना से प्रभावित नहीं हो रहा, जिसमें अभियोजन पक्ष के गवाहों को उनके कार्यस्थल से साक्ष्य देने की अनुमति दी गई है? हम समझते हैं कि औपचारिक गवाहों और जांच अधिकारियों (आईओ) के लिए कुछ कठिनाइयां हो सकती हैं। आपको स्थान निर्दिष्ट करने का अधिकार है, इसमें कोई आपत्ति नहीं, लेकिन पुलिस स्टेशन क्यों? यही सवाल है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि उपराज्यपाल एक तटस्थ स्थान चुन सकते हैं, जो पुलिस स्टेशनों से अलग हो। कोर्ट ने कहा, आप एक ऐसा स्थान चुन सकते हैं जो आपके कार्यस्थल से दूर हो।
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अभियोजन गवाह की गवाही अभियुक्त की उपस्थिति में क्यों ली जाती है? सिर्फ इसलिए ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो। ताकि अभियुक्त को पता हो कि उसके खिलाफ कौन सा साक्ष्य प्रस्तुत किया जा रहा है और उसे उसका खंडन करने का अवसर मिले। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अगली सुनवाई तक इस मुद्दे पर निर्देश लेने की बात कही। कोर्ट ने मामले को 10 दिसंबर के लिए स्थगित कर दिया, साथ ही एक अन्य समान याचिका को भी उसी तारीख पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
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यह है मामला
यह मामला अधिवक्ता राज गौरव द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) के तहत सुना जा रहा है, जिसमें 13 अगस्त की अधिसूचना को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह अधिसूचना आपराधिक मुकदमों की निष्पक्षता और तटस्थता को कमजोर करती है, क्योंकि यह गवाहों की जांच और जिरह को नियंत्रित परिसरों में करने की अनुमति देती है।



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