सर्वे कंपनियों से पूछ रहे नेता, भाई मैं चुनाव जीतूंगा या हारूँगा
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चुनाव में अपनी जमीनी स्थिति पता करने के लिए और उपयुक्त उम्मीदवारों को टिकट देने के मामले में सभी राजनीतिक दल सर्वे पर भरोसा कर रहे हैं। इसके लिए पार्टी कार्यकर्ताओं के सर्वे के साथ-साथ प्रोफेशनल प्राइवेट सर्वे कंपनियों का भी सहारा लिया जा रहा है।
वहीं अब उम्मीदवार भी अपनी हार या जीत का सही आकलन करने के लिए सर्वे के नतीजों पर भरोसा करने लगे हैं। इससे वे अनुमान लगा पा रहे हैं कि जीत हासिल करने के लिए उन्हें किन क्षेत्रों में ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है। उम्मीदवार के स्तर पर एक सर्वे का खर्च भी अन्य चुनावी खर्चों के लिहाज से बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता।
एक व्यक्ति के सैंपल के लिए सर्वे कंपनियां 25 से 50 रुपये तक वसूल रही हैं। इस प्रकार अगर एक विधानसभा में 5000 का आदर्श सैंपल साइज भी लिया जाता है, तो यह खर्च एक लाख रुपये से 2.50 लाख रुपये के बीच ही आ रहा है। बड़ी विधानसभा के हिसाब से यह खर्च कुछ ज्यादा भी हो सकता है।
क्या होता है सैंपल साइज
उम्मीदवारों की जीत या हार का सर्वे बेहद सघन स्तर पर किया जा रहा है। इसके लिए किसी भी विधानसभा क्षेत्र में जितने वार्ड हैं, हर वार्ड से न्यूनतम एक हजार लोगों से बातचीत किया जा रहा है। सर्वे कंपनियां किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार के लिए उस विधानसभा से न्यूनतम पांच हजार लोगों से पूछताछ कर उनकी राय जानने की कोशिश करती हैं जिससे सर्वे का परिणाम सच के ज्यादा से ज्यादा निकट हो।
इसके आलावा हर विधानसभा क्षेत्र में जितने भी धार्मिक, जातीय या वर्ग हैं, उन सबसे बातचीत करके उनकी राय ली जा रही है। इससे उम्मीदवारों को इस बात का सटीक अंदाजा मिल जा रहा है कि उनकी किस वर्ग में पैठ है और किस वर्ग से उन्हें वोट मिलने की उम्मीद नहीं है। इससे उन्हें अपने सियासी समीकरण बनाने में मदद मिल रही है।
सर्वे कितना सही
कांग्रेस के एक पूर्व विधायक ने अमर उजाला को बताया कि वे हर चुनाव के पूर्व एक सर्वे कंपनी से सर्वे करवाते हैं। अब तक का उनका अनुभव रहा है कि सर्वे सच के बेहद करीब का आइना दिखा देते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले चुनाव में सर्वे में उन्हें पांच हजार वोटों से हारता हुआ बताया गया था, जो चुनाव परिणाम में बिलकुल सच साबित हुआ।
उसके पूर्व के चुनाव में वे चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे और वही परिणाम सर्वे में भी दिखाया गया था। इन सर्वे की विश्वसनीयता इस बात से भी तय होती है कि सर्वे करने वाला कर्मचारी हर व्यक्ति से उसका नाम, मोबाइल नंबर और उसकी एरिया की पूछताछ करके परिणाम देता है।
इनकी विश्वसनीयता को क्रॉस चेक भी किया जा सकता है। इस प्रकार सर्वे ज्यादा विश्वसनीय बनाया जाता है।
भाजपा पार्टी संगठन में उच्च पद पर बने हुए एक पूर्वांचली नेता इस बार पूर्वी दिल्ली की एक सीट से अपनी दावेदारी कर रहे हैं। उनका अनुभव है कि जनता अपनी स्पष्ट राय नेताओं को कभी नहीं बताती है। लेकिन सर्वे कंपनियों का सर्वे इकट्ठा करने का तरीका इतना विश्वसनीय होता है कि लोग उन्हें अपनी सच्चाई बता देते हैं।
इससे उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति का आभास मिल जाता है। उनका भी अनुभव है कि इस तरह के सर्वे से सच के करीब की जानकारी उन्हें हो जाती है।
क्या कहती हैं सर्वे कंपनियां
नोएडा में स्थित एक सर्वे कंपनी आइडियल फैक्ट्स सर्वे के वरिष्ठ अधिकारी आदर्श शर्मा ने बताया कि उनका यह सर्वे उम्मीदवार की इच्छा के आधार पर कई चरणों में होता है। टिकट मिलने के पहले कई उम्मीदवार यह समझने की कोशिश करते हैं कि किस सीट से चुनाव लड़ने पर उनकी जीतने की गुंजाइश ज्यादा है।
किसी पार्टी के आधार पर उनके मतों में कितना इजाफा हो सकता है। जब सभी दलों के उम्मीदवारों को टिकट मिल जाती है तब वे यह जानने की कोशिश करते हैं कि उम्मीदवारों के बीच कोई व्यक्ति जीतने की स्थिति में है या नहीं।
इस प्रकार दो या तीन चरणों में सर्वे किया जाता है। आदर्श के मुताबिक ये सर्वे सच के काफी करीब होते हैं। उन्होंने बताया कि अभी तक वे दिल्ली विधानसभा चुनाव के तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों के लगभग एक दर्जन नेताओं के लिए सर्वे कर चुके हैं।