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Delhi Court : अदालत ने कहा- अनावश्यक नजरबंदी का हर सेकंड आरोपी के अधिकारों में हस्तक्षेप
Thu, 19 May 2022 04:55 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 19 May 2022 04:55 AM IST
सार
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून के अधिकार के बिना स्वतंत्रता से वंचित करने का प्रावधान करता है। अदालत ने फैसले में कहा कि उनकी राय में अनावश्यक हिरासत के हर मिलीसेकंड से काफी फर्क पड़ता है और यह आरोपी के अधिकारों के साथ अनुचित हस्तक्षेप के समान है।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
अदालत ने आतंकवाद के आरोपी हबीबुर रहमान को अंतरिम जमानत देते हुए कहा कि अनावश्यक नजरबंदी का हर मिलीसेकंड आरोपी के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है।
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून के अधिकार के बिना स्वतंत्रता से वंचित करने का प्रावधान करता है। अदालत ने फैसले में कहा कि उनकी राय में अनावश्यक हिरासत के हर मिलीसेकंड से काफी फर्क पड़ता है और यह आरोपी के अधिकारों के साथ अनुचित हस्तक्षेप के समान है।
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इस मामले में आरोपी पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा के तहत आरोप लगाए गए है। यह प्रावधान आतंकवादी कृत्यों और जाली मुद्रा के प्रसार से संबंधित हैं।
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आरोपी पर नकली भारतीय मुद्रा नोटों के व्यापार में शामिल एक अपराध सिंडिकेट का सदस्य होने का आरोप लगाया गया है और जांच एजेंसी ने उसके और एक सह-अभियुक्त के बीच हुई बातचीत से उसकी संलिप्तता दिखाई है।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा कथित अवरोधन के संबंध में कोई मंजूरी आदेश रिकॉर्ड में नहीं लाया गया। हालांकि केंद्रीय गृह सचिव के मंजूरी आदेश का उल्लेख करते हुए पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) (विशेष प्रकोष्ठ) द्वारा नोडल अधिकारी को संबोधित एक संचार रिकॉर्ड पर उपलब्ध है। यह आदेश दिसंबर 2020 में पारित किया गया था। न्यायाधीश राणा ने कहा कि पुलिस के जवाब से यह स्पष्ट नहीं है कि विचाराधीन मंजूरी आदेश की प्रति रिकॉर्ड पर क्यों नहीं रखी गई।
पिछली दो तारीखों से यह अदालत उस मंजूरी आदेश के अभाव में मामले को स्थगित कर रही है। अब सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) विशेष प्रकोष्ठ की ओर से रिकॉर्ड पर एक बहुत ही अस्पष्ट जवाब दायर किया गया है, जिसमें अदालत को बताया गया है कि उक्त मंजूरी आदेश को समाप्त कर दिया गया है।
अदालत ने कहा जवाब में यह स्पष्ट नहीं है कि केंद्रीय गृह सचिव के कार्यालय से उक्त मंजूरी आदेश को हटाने की पुष्टि करने वाला क्या आध्सांर है। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी द्वारा दी गई आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर गुण-दोष के आधार पर कोई आदेश पारित करने के लिए इच्छुक नहीं है साथ ही अदालत अभियुक्तों के अधिकारों के बारे में काफी जागरूक है।
अदालत ने केंद्रीय गृह सचिव को मामले को देखने और मंजूरी आदेश की स्थिति पर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। साथ ही दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ के विशेष आयुक्त को उन परिस्थितियों के बारे में अवगत कराने के लिए कहा गया है जिसमें मंजूरी आदेश की प्रति को हटा दिया गया और इसे चार्जशीट के साथ रिकॉर्ड पर क्यों नहीं रखा गया ।