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सांसों में पहुंचा घातक रसायन न्यूमोनिटिस
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नई दिल्ली। प्रतिबंध के बाद भी दिवाली पर खुलेआम हुई आतिशबाजी ने राजधानी की आबोहवा को और बिगाड़ दिया है। पटाखों से निकलने वाले विषाक्त पदार्थों के कारण लोगों को सांस लेना तक मुश्किल हो गया है। इसकी वजह से एक ही दिन में दिल्ली के अस्पतालों में कई मरीज भर्ती हुए हैं, जिनमें पटाखों से निकलने वाले रसायन न्यूमोनिटिस की पहचान हुई है। उनके परिजनों को रात अस्पताल में ही गुजारनी पड़ी। लोगों के खून में छोटे प्रदूषण कण घुल गए हैं।
मैक्स अस्पताल के डॉ. विकास गोस्वामी का कहना है कि पटाखों से निकलने वाले रसायन और स्मॉग से फेफड़ों में कठोरता आ सकती है। इससे शरीर को ऑक्सीजन पहुंचाने की फेफड़ों की क्षमता कम हो जाती है। उपचार नहीं किया जाए तो यह स्थिति श्वसन विफलता, फेफड़ों के कैंसर या यहां तक कि मृत्यु का कारण बन सकती है। उन्होंने बताया कि इस बार उनके यहां रसायन न्यूमोनिटिस के कई मामले सामने आए।
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की वरिष्ठ डॉक्टर उमा कुमार ने बताया कि दिवाली की रात प्रदूषण बढ़ने से रसायनों के छोटे-छोटे कण सांसों के जरिये शरीर में पहुंचने के बाद खून में घुल रहे हैं, जो किसी भी व्यक्ति को जानलेवा बीमारियों की चपेट में ले जाने के लिए काफी हैं। उन्होंने एम्स के ही चिकित्सीय अध्ययन का हवाला देते हुए यह जानकारी दी।
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अचानक प्रदूषण बढ़ने के कारण दिवाली की रात कई परिवारों को अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े। डेंगू, मलेरिया और मौसमी बीमारियों, कोरोना संक्रमण के साथ प्रदूषण के कारण मरीजों की संख्या और बढ़ गई है। इससे अस्पतालों में कई गुना भार भी बढ़ गया है। स्थिति यह है कि ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में फिलहाल बिस्तर तक उपलब्ध नहीं हैं।
डॉ. गोस्वामी ने बताया कि न्यूमोनिटिस से ग्रस्त दो अलग तरह के मरीज हैं। कुछ लोग खांसी, सांस लेने में तकलीफ, फेफड़े की असामान्य आवाज (गीली, तेज आवाज में सांस लेना), सीने में दर्द, जकड़न या जलन जैसे लक्षण लेकर पहुंच रहे हैं। उधर, कई लोग लगातार खांसी, सांस की तकलीफ और श्वसन की बीमारी के कारण भर्ती हुए हैं। उन्होंने बताया कि क्रोनिक केमिकल न्यूमोनाइटिस के ये लक्षण कई बार मौजूद नहीं भी हो सकते हैं और इन्हें नजर आने में महीनों लग सकते हैं।
डॉक्टरों के अनुसार, इस समय दिल्ली की हवा में कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, मैगनीज डाइऑक्साइड, जिंक ऑक्साइड, नाइट्रेट्स जैसे खतरनाक रसायन हैं। न्यूमोनिटिस रसायन सीधे असर करने वाला है, जो फेफड़ों में जलन महसूस कराता है। इससे सांस लेने में कठिनाई होती है।
ऐसे खून में घुल रहे जहरीले रसायन
पीएम2.5 और एक माइक्रॉन जितने छोटे आकार के कण सांस लेते वक्त शरीर के अंदर जाकर खून में घुल जाते हैं। शरीर का प्रतिरोधी तंत्र इन्हें बाहरी कण समझकर इनसे लड़ने के लिए एंटीबॉडी पैदा करने लगता है। ये एंटीबॉडी घुटनों या दूसरे जोड़ों की कोशिकाओं पर भी हमला करने लगते हैं। प्रोफेसर उमा ने बताया कि एक अध्ययन में साबित हो चुका है कि जब प्रदूषण स्तर में इजाफा होता है तो गठिया पीड़ित लोगों में इसके लक्षण बढ़ने लगते हैं। इससे जोड़ों में दर्द, जकड़न और सूजन की परेशानी हो सकती है। डॉ. उमा ने बताया कि गठिया के लक्षण दिख रहे हैं तो रूमेटोलॉजिस्ट से मिलने में संकोच नहीं करना चाहिए। इलाज जितना जल्दी शुरू होगा, उतना ही जोड़ों को कम नुकसान पहुंचेगा। भविष्य में जोड़ों के विकार के आसार कम होंगे।
सरकारी अस्पतालों में बढ़ी ओपीडी
शुक्रवार को दिल्ली सरकार के लोकनायक अस्पताल में 65 से ज्यादा मरीज गंभीर स्थिति में पहुंचे हैं। डीडीयू, राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी, जीटीबी, डॉ. हेडगेवार और डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल को मिलाकर करीब 210 मरीज सांस लेने में तकलीफ और छाती में दर्द की शिकायत लेकर आ चुके हैं। वहीं, एम्स की इमरजेंसी में ही 150 से ज्यादा मरीज पिछले दो दिन में पहुंचे हैं। एम्स के डॉक्टरों ने बताया कि हवा की गुणवत्ता में जल्द ही कोई सुधार होता है तो इससे अस्थमा सहित अन्य तमाम बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को फायदा पहुंचेगा।
यहां भी बढ़े मरीज
साकेत मैक्स और वसंत कुंज फोर्टिस अस्पताल के अलावा पारस, बीएलके, अपोलो अस्पताल में रोज 500 से ज्यादा मरीज ओपीडी में पहुंच रहे हैं। कालरा अस्पताल में पिछले तीन दिन में 100 से ज्यादा मरीजों की ओपीडी बढ़ चुकी है। यहां शुक्रवार को करीब 35 मरीज ऐसे पहुंचे, जिन्हें प्रदूषण की वजह से कफ और सांस लेने में गंभीर समस्या थी। वहीं बालाजी अस्पताल के डॉ. अरविंद अग्रवाल का कहना है कि दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने से लोगों को सिर्फ सांस लेने में ही दिक्कत नहीं होती, बल्कि उनका पूरा शरीर इससे प्रभावित होता है। उनके यहां एक ही दिन में 12 से अधिक अस्थमा मरीज पहुंचे हैं। धर्मशिला नारायणा अस्पताल के डॉ. नवनीत सूद ने बताया कि एक दिन में अचानक मरीजों की संख्या बढ़ी है। दिवाली की रात ही कई लोग इमरजेंसी में इलाज कराने पहुंचे।
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मैक्स अस्पताल के डॉ. विकास गोस्वामी का कहना है कि पटाखों से निकलने वाले रसायन और स्मॉग से फेफड़ों में कठोरता आ सकती है। इससे शरीर को ऑक्सीजन पहुंचाने की फेफड़ों की क्षमता कम हो जाती है। उपचार नहीं किया जाए तो यह स्थिति श्वसन विफलता, फेफड़ों के कैंसर या यहां तक कि मृत्यु का कारण बन सकती है। उन्होंने बताया कि इस बार उनके यहां रसायन न्यूमोनिटिस के कई मामले सामने आए।
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नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की वरिष्ठ डॉक्टर उमा कुमार ने बताया कि दिवाली की रात प्रदूषण बढ़ने से रसायनों के छोटे-छोटे कण सांसों के जरिये शरीर में पहुंचने के बाद खून में घुल रहे हैं, जो किसी भी व्यक्ति को जानलेवा बीमारियों की चपेट में ले जाने के लिए काफी हैं। उन्होंने एम्स के ही चिकित्सीय अध्ययन का हवाला देते हुए यह जानकारी दी।
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अचानक प्रदूषण बढ़ने के कारण दिवाली की रात कई परिवारों को अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े। डेंगू, मलेरिया और मौसमी बीमारियों, कोरोना संक्रमण के साथ प्रदूषण के कारण मरीजों की संख्या और बढ़ गई है। इससे अस्पतालों में कई गुना भार भी बढ़ गया है। स्थिति यह है कि ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में फिलहाल बिस्तर तक उपलब्ध नहीं हैं।
डॉ. गोस्वामी ने बताया कि न्यूमोनिटिस से ग्रस्त दो अलग तरह के मरीज हैं। कुछ लोग खांसी, सांस लेने में तकलीफ, फेफड़े की असामान्य आवाज (गीली, तेज आवाज में सांस लेना), सीने में दर्द, जकड़न या जलन जैसे लक्षण लेकर पहुंच रहे हैं। उधर, कई लोग लगातार खांसी, सांस की तकलीफ और श्वसन की बीमारी के कारण भर्ती हुए हैं। उन्होंने बताया कि क्रोनिक केमिकल न्यूमोनाइटिस के ये लक्षण कई बार मौजूद नहीं भी हो सकते हैं और इन्हें नजर आने में महीनों लग सकते हैं।
डॉक्टरों के अनुसार, इस समय दिल्ली की हवा में कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, मैगनीज डाइऑक्साइड, जिंक ऑक्साइड, नाइट्रेट्स जैसे खतरनाक रसायन हैं। न्यूमोनिटिस रसायन सीधे असर करने वाला है, जो फेफड़ों में जलन महसूस कराता है। इससे सांस लेने में कठिनाई होती है।
ऐसे खून में घुल रहे जहरीले रसायन
पीएम2.5 और एक माइक्रॉन जितने छोटे आकार के कण सांस लेते वक्त शरीर के अंदर जाकर खून में घुल जाते हैं। शरीर का प्रतिरोधी तंत्र इन्हें बाहरी कण समझकर इनसे लड़ने के लिए एंटीबॉडी पैदा करने लगता है। ये एंटीबॉडी घुटनों या दूसरे जोड़ों की कोशिकाओं पर भी हमला करने लगते हैं। प्रोफेसर उमा ने बताया कि एक अध्ययन में साबित हो चुका है कि जब प्रदूषण स्तर में इजाफा होता है तो गठिया पीड़ित लोगों में इसके लक्षण बढ़ने लगते हैं। इससे जोड़ों में दर्द, जकड़न और सूजन की परेशानी हो सकती है। डॉ. उमा ने बताया कि गठिया के लक्षण दिख रहे हैं तो रूमेटोलॉजिस्ट से मिलने में संकोच नहीं करना चाहिए। इलाज जितना जल्दी शुरू होगा, उतना ही जोड़ों को कम नुकसान पहुंचेगा। भविष्य में जोड़ों के विकार के आसार कम होंगे।
सरकारी अस्पतालों में बढ़ी ओपीडी
शुक्रवार को दिल्ली सरकार के लोकनायक अस्पताल में 65 से ज्यादा मरीज गंभीर स्थिति में पहुंचे हैं। डीडीयू, राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी, जीटीबी, डॉ. हेडगेवार और डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल को मिलाकर करीब 210 मरीज सांस लेने में तकलीफ और छाती में दर्द की शिकायत लेकर आ चुके हैं। वहीं, एम्स की इमरजेंसी में ही 150 से ज्यादा मरीज पिछले दो दिन में पहुंचे हैं। एम्स के डॉक्टरों ने बताया कि हवा की गुणवत्ता में जल्द ही कोई सुधार होता है तो इससे अस्थमा सहित अन्य तमाम बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को फायदा पहुंचेगा।
यहां भी बढ़े मरीज
साकेत मैक्स और वसंत कुंज फोर्टिस अस्पताल के अलावा पारस, बीएलके, अपोलो अस्पताल में रोज 500 से ज्यादा मरीज ओपीडी में पहुंच रहे हैं। कालरा अस्पताल में पिछले तीन दिन में 100 से ज्यादा मरीजों की ओपीडी बढ़ चुकी है। यहां शुक्रवार को करीब 35 मरीज ऐसे पहुंचे, जिन्हें प्रदूषण की वजह से कफ और सांस लेने में गंभीर समस्या थी। वहीं बालाजी अस्पताल के डॉ. अरविंद अग्रवाल का कहना है कि दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने से लोगों को सिर्फ सांस लेने में ही दिक्कत नहीं होती, बल्कि उनका पूरा शरीर इससे प्रभावित होता है। उनके यहां एक ही दिन में 12 से अधिक अस्थमा मरीज पहुंचे हैं। धर्मशिला नारायणा अस्पताल के डॉ. नवनीत सूद ने बताया कि एक दिन में अचानक मरीजों की संख्या बढ़ी है। दिवाली की रात ही कई लोग इमरजेंसी में इलाज कराने पहुंचे।