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दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र से मांगा जवाब पत्नी को बिना वजह से तलाक देने के मामले में पुरुष के अधिकार को दी गई थी चुन
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नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक व्यक्ति की ओर से पत्नी को बगैर किसी कारण तलाक (तलाक-उल-सुन्नत) देने और उसे एडवोकेट नोटिस दिए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने नोटिस जारी कर केंद्र को आठ सप्ताह के अंदरजवाब दाखिल करने को कहा है। स्थायी वकील मोनिका अरोड़ा ने इस मामले में केंद्र का प्रतिनिधित्व किया।
मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 3 के अनुसार किसी पुरुष द्वारा पत्नी से मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप या किसी और तरीके से तलाक देने को अवैध माना जाएगा। याचिकाकर्ता महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि यह प्रथा मनमानी, शरीयत विरोधी, असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और बर्बर है। याचिका में किसी भी समय पत्नी को तलाक देने के लिए पति के इस अधिकार को मनमानी घोषित करने सहित इस पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की गई। साथ ही निर्देश मांगा कि मुस्लिम विवाह केवल एक अनुबंध नहीं है, बल्कि यह एक स्थिति है। याचिका 28 वर्षीय मुस्लिम महिला की तरफ से दायर की गई थी। इसमें कहा गया कि पिछले साल आठ अगस्त को ‘तीन तलाक’ कहकर उसे, पति ने छोड़ दिया था। बाद में उसने अपने पति को वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कानूनी नोटिस दिया था। याचिका में कहा गया है कि कानूनी नोटिस के जवाब में पति ने ‘तीन तलाक’ की घोषणा से इनकार करते हुए महिला से नोटिस मिलने के 15 दिनों के अंदर उसे तलाक देने के लिए कह दिया।
महिला ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि बिना किसी कारण पत्नी को तलाक देने के लिए मुस्लिम पति की ओर से कथित तौर पर इस तरह का कदम उठाया जाना, दुरुपयोग है। मामले में पेश हुए वकील ने समझाया था कि ‘तलाक-उल-सुन्नत’ तलाक (तलाक) का एक प्रतिसंहरणीय रूप है क्योंकि इस रूप में तलाक के परिणाम एक बार में अंतिम नहीं होते हैं और समझौता और सुलह की संभावना होती है। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2017 में माना था कि मुसलमानों के बीच तीन तलाक की प्रथा अवैध और असंवैधानिक है। बाद में मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 अस्तित्व में आया। इसके तहत मुसलमानों के बीच तीन तलाक के माध्यम से तत्काल तलाक की प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। उच्च न्यायालय में दायर अपनी याचिका में महिला ने दावा किया कि उसे पता चला कि वह व्यक्ति उसे दूसरी शादी के लिए तलाक देने की योजना बना रहा था।
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मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 3 के अनुसार किसी पुरुष द्वारा पत्नी से मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप या किसी और तरीके से तलाक देने को अवैध माना जाएगा। याचिकाकर्ता महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि यह प्रथा मनमानी, शरीयत विरोधी, असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और बर्बर है। याचिका में किसी भी समय पत्नी को तलाक देने के लिए पति के इस अधिकार को मनमानी घोषित करने सहित इस पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की गई। साथ ही निर्देश मांगा कि मुस्लिम विवाह केवल एक अनुबंध नहीं है, बल्कि यह एक स्थिति है। याचिका 28 वर्षीय मुस्लिम महिला की तरफ से दायर की गई थी। इसमें कहा गया कि पिछले साल आठ अगस्त को ‘तीन तलाक’ कहकर उसे, पति ने छोड़ दिया था। बाद में उसने अपने पति को वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कानूनी नोटिस दिया था। याचिका में कहा गया है कि कानूनी नोटिस के जवाब में पति ने ‘तीन तलाक’ की घोषणा से इनकार करते हुए महिला से नोटिस मिलने के 15 दिनों के अंदर उसे तलाक देने के लिए कह दिया।
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महिला ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि बिना किसी कारण पत्नी को तलाक देने के लिए मुस्लिम पति की ओर से कथित तौर पर इस तरह का कदम उठाया जाना, दुरुपयोग है। मामले में पेश हुए वकील ने समझाया था कि ‘तलाक-उल-सुन्नत’ तलाक (तलाक) का एक प्रतिसंहरणीय रूप है क्योंकि इस रूप में तलाक के परिणाम एक बार में अंतिम नहीं होते हैं और समझौता और सुलह की संभावना होती है। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2017 में माना था कि मुसलमानों के बीच तीन तलाक की प्रथा अवैध और असंवैधानिक है। बाद में मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 अस्तित्व में आया। इसके तहत मुसलमानों के बीच तीन तलाक के माध्यम से तत्काल तलाक की प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। उच्च न्यायालय में दायर अपनी याचिका में महिला ने दावा किया कि उसे पता चला कि वह व्यक्ति उसे दूसरी शादी के लिए तलाक देने की योजना बना रहा था।
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