फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   crime

दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र से मांगा जवाब पत्नी को बिना वजह से तलाक देने के मामले में पुरुष के अधिकार को दी गई थी चुन

Thu, 13 Jan 2022 02:00 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Thu, 13 Jan 2022 02:00 AM IST
विज्ञापन
crime
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक व्यक्ति की ओर से पत्नी को बगैर किसी कारण तलाक (तलाक-उल-सुन्नत) देने और उसे एडवोकेट नोटिस दिए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने नोटिस जारी कर केंद्र को आठ सप्ताह के अंदरजवाब दाखिल करने को कहा है। स्थायी वकील मोनिका अरोड़ा ने इस मामले में केंद्र का प्रतिनिधित्व किया।
विज्ञापन

मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 3 के अनुसार किसी पुरुष द्वारा पत्नी से मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप या किसी और तरीके से तलाक देने को अवैध माना जाएगा। याचिकाकर्ता महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि यह प्रथा मनमानी, शरीयत विरोधी, असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और बर्बर है। याचिका में किसी भी समय पत्नी को तलाक देने के लिए पति के इस अधिकार को मनमानी घोषित करने सहित इस पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की गई। साथ ही निर्देश मांगा कि मुस्लिम विवाह केवल एक अनुबंध नहीं है, बल्कि यह एक स्थिति है। याचिका 28 वर्षीय मुस्लिम महिला की तरफ से दायर की गई थी। इसमें कहा गया कि पिछले साल आठ अगस्त को ‘तीन तलाक’ कहकर उसे, पति ने छोड़ दिया था। बाद में उसने अपने पति को वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कानूनी नोटिस दिया था। याचिका में कहा गया है कि कानूनी नोटिस के जवाब में पति ने ‘तीन तलाक’ की घोषणा से इनकार करते हुए महिला से नोटिस मिलने के 15 दिनों के अंदर उसे तलाक देने के लिए कह दिया।
विज्ञापन

महिला ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि बिना किसी कारण पत्नी को तलाक देने के लिए मुस्लिम पति की ओर से कथित तौर पर इस तरह का कदम उठाया जाना, दुरुपयोग है। मामले में पेश हुए वकील ने समझाया था कि ‘तलाक-उल-सुन्नत’ तलाक (तलाक) का एक प्रतिसंहरणीय रूप है क्योंकि इस रूप में तलाक के परिणाम एक बार में अंतिम नहीं होते हैं और समझौता और सुलह की संभावना होती है। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2017 में माना था कि मुसलमानों के बीच तीन तलाक की प्रथा अवैध और असंवैधानिक है। बाद में मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 अस्तित्व में आया। इसके तहत मुसलमानों के बीच तीन तलाक के माध्यम से तत्काल तलाक की प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। उच्च न्यायालय में दायर अपनी याचिका में महिला ने दावा किया कि उसे पता चला कि वह व्यक्ति उसे दूसरी शादी के लिए तलाक देने की योजना बना रहा था।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed