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Delhi News: हवाला डीलर असलम वानी की याचिका पर कोर्ट ने ईडी से मांगा जवाब
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से कथित हवाला डीलर मोहम्मद असलम वानी की उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें उन्होंने उसके खिलाफ दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग मामले को रद्द करने की मांग की गई है। जस्टिस संजीव नरूला ने ईडी को नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई 26 सितंबर निर्धारित की।
वानी ने मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत दर्ज मामले को रद्द करने की मांग की। याचिका में उसने 2010 के एक ट्रायल कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें उसे 2005 के मामले में आतंकी फंडिंग के आरोपों से बरी कर दिया गया था। इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2017 में बरकरार रखा था। वानी के वकील एमएस खान ने बताया कि उनके मुवक्किल को केवल शस्त्र अधिनियम के तहत हथियार रखने के लिए दोषी ठहराया गया था। खान ने तर्क दिया कि चूंकि मूल अपराध (शेड्यूल्ड ऑफेंस) के आरोप सिद्ध नहीं हुए, इसलिए पीएमएलए के तहत कार्यवाही भी टिक नहीं सकती। खान ने यह भी कहा कि वानी लंबे समय से चल रहे मुकदमे की धीमी प्रगति से परेशान हैं। जनवरी 2017 में वानी और सह-आरोपी कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर शाह के खिलाफ आरोप तय किए गए थे, लेकिन सात साल बीतने के बावजूद 33 गवाहों में से केवल चार की ही जांच हो पाई है।
यह मामला अगस्त 2005 से जुड़ा है, जब दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने वानी को 63 लाख रुपये और हथियारों के जखीरे के साथ गिरफ्तार किया था। यह राशि कथित तौर पर मध्य पूर्व से हवाला के जरिए प्राप्त हुई थी। वानी ने दावा किया था कि इसमें से 50 लाख रुपये शब्बीर शाह को और 10 लाख रुपये जैश-ए-मोहम्मद के क्षेत्र कमांडर अबु बकर को देने थे, जबकि शेष राशि उनकी कमीशन थी। वानी ने यह भी स्वीकार किया था कि उन्होंने शाह और उनके रिश्तेदारों को कई किश्तों में लगभग 2.25 करोड़ रुपये पहुंचाए थे।
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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से कथित हवाला डीलर मोहम्मद असलम वानी की उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें उन्होंने उसके खिलाफ दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग मामले को रद्द करने की मांग की गई है। जस्टिस संजीव नरूला ने ईडी को नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई 26 सितंबर निर्धारित की।
वानी ने मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत दर्ज मामले को रद्द करने की मांग की। याचिका में उसने 2010 के एक ट्रायल कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें उसे 2005 के मामले में आतंकी फंडिंग के आरोपों से बरी कर दिया गया था। इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2017 में बरकरार रखा था। वानी के वकील एमएस खान ने बताया कि उनके मुवक्किल को केवल शस्त्र अधिनियम के तहत हथियार रखने के लिए दोषी ठहराया गया था। खान ने तर्क दिया कि चूंकि मूल अपराध (शेड्यूल्ड ऑफेंस) के आरोप सिद्ध नहीं हुए, इसलिए पीएमएलए के तहत कार्यवाही भी टिक नहीं सकती। खान ने यह भी कहा कि वानी लंबे समय से चल रहे मुकदमे की धीमी प्रगति से परेशान हैं। जनवरी 2017 में वानी और सह-आरोपी कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर शाह के खिलाफ आरोप तय किए गए थे, लेकिन सात साल बीतने के बावजूद 33 गवाहों में से केवल चार की ही जांच हो पाई है।
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यह मामला अगस्त 2005 से जुड़ा है, जब दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने वानी को 63 लाख रुपये और हथियारों के जखीरे के साथ गिरफ्तार किया था। यह राशि कथित तौर पर मध्य पूर्व से हवाला के जरिए प्राप्त हुई थी। वानी ने दावा किया था कि इसमें से 50 लाख रुपये शब्बीर शाह को और 10 लाख रुपये जैश-ए-मोहम्मद के क्षेत्र कमांडर अबु बकर को देने थे, जबकि शेष राशि उनकी कमीशन थी। वानी ने यह भी स्वीकार किया था कि उन्होंने शाह और उनके रिश्तेदारों को कई किश्तों में लगभग 2.25 करोड़ रुपये पहुंचाए थे।
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