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जंमर मंतर पर नारेबाजी मामला: सेव इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रीत सिंह की जमानत याचिका खारिज
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नई दिल्ली। अदालत ने जंतर-मंतर पर एक समुदाय के खिलाफ नारेबाजी मामले में आरोपी एवं सेव इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रीत सिंह को शनिवार को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा आरोपी स्पष्ट रूप से अन्य सहयोगियों के साथ भड़काऊ भाषणों में सक्रिय रूप से शामिल था। कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर दिए गए भाषणों में भड़काऊ और आग लगाने वाली सामग्री के लिए खुद को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता। इतना ही नहीं वह उक्त कार्यक्रम का सह आयोजक भी था।
पटियाला हाउस अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनिल अंतिल ने अपने फैसले में कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर पेश साक्ष्यों व अभियोजन पक्ष के तर्कों से स्पष्ट है कि आरोपी ने कार्यक्रम के आयोजन के मुख्य आयोजक के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई। हालांकि दिल्ली पुलिस ने इस आयोजन को मंजूरी देेने से इनकार कर दिया था। इसके अलावा यह आयोजन भारत सरकार द्वारा जारी किए गए कोविड-19 प्रोटोकॉल की पूर्ण अवहेलना करके जंतर-मंतर पर किया गया।
अदालत ने आरोपी के उस तर्क को खारिज कर दिया कि कार्यपालिका के मनमाने कृत्यों से भाषण की स्वतंत्रता के उनके अधिकार को कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा संविधान में सभा करने और अपने विचार व्यक्त करने के अधिकार दिए गए हैं, लेकिन ये अधिकार निरंकुश नहीं हैं। अंतर्निहित उपयुक्त प्रतिबंधों के साथ इनका उपयोग किया जाना चाहिए।
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अदालत ने कहा सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि आरोपी ने स्वेच्छा से कार्यक्रम का आयोजन किया बल्कि सक्रिय रूप से भाग लिया और भड़काऊ भाषणों के विचारों और सामग्री को समर्थन प्रदान किया।
अदालत ने कहा आरोपी से एक फाउंडेशन के अध्यक्ष के रूप में यह उम्मीद की जाती है कि वह व्यापक हित में इस तरह के भड़काऊ विचारों को रोकता। वहीं आरोपी दूसरी ओर स्पष्ट रूप से अपने अन्य सहयोगियों के साथ भड़काऊ भाषणों में सक्रिय रूप से भाग लेते देखा गया है।
अदालत ने उसके उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि उसने किसी भी धर्म या समाज के किसी अन्य वर्ग के खिलाफ कोई शब्द नहीं कहा। अदालत ने कहा उस मामले में आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया पेश दस्तावेज से स्पष्ट है। अदालत ने उसके उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि उसके खिलाफ धारा 153-ए के तहत मामला नहीं बनता।
आरोपी ने तर्क दिया कि उसके खिलाफ धारा 153 ए को छोड़ कर अन्य अपराध जमानती हैं। याची ने कहा कि उसका संविधान पर पूरा विश्वास है और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते उसे पूरी तरह संज्ञान है कि कानून व्यवस्था के खिलाफ जाने के क्या परिणाम हो सकते हैं। वह समारोह में मात्र गांधी जी के भारत छोड़ो मूवमेंट कार्यक्रम में गया था। उसका नाम प्राथमिकी में नहीं है। उसे फर्जी मामले में फंसाया गया है ऐसे में जमानत प्रदान की जाए।
वहीं सरकारी वकील ने जमानत आवेदन पर विरोध जताते हुए कहा कि पेश वीडियो से स्पष्ट है कि आरोपी ने एक समुदाय विशेष के खिलाफ भाषण देकर लोगों को उकसाया। आरोपी ने दो समुदायों के बीच नफरत पैदा करने का प्रयास किया। अभी भी मामले में कई आरोपी फरार हैं।
इससे पहले कोर्ट ने मामले में भूपेंद्र तोमर उर्फ पिंकी चौधरी की ओर से दायर अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने भी पिंकी को जमानत देने से इनकार कर दिया है।
अदालत ने चौधरी को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि हम तालिबान राज्य नहीं हैं। हमारे बहुल और बहुसांस्कृतिक समाज में कानून के शासन पवित्र सिद्धांत है।
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पटियाला हाउस अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनिल अंतिल ने अपने फैसले में कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर पेश साक्ष्यों व अभियोजन पक्ष के तर्कों से स्पष्ट है कि आरोपी ने कार्यक्रम के आयोजन के मुख्य आयोजक के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई। हालांकि दिल्ली पुलिस ने इस आयोजन को मंजूरी देेने से इनकार कर दिया था। इसके अलावा यह आयोजन भारत सरकार द्वारा जारी किए गए कोविड-19 प्रोटोकॉल की पूर्ण अवहेलना करके जंतर-मंतर पर किया गया।
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अदालत ने आरोपी के उस तर्क को खारिज कर दिया कि कार्यपालिका के मनमाने कृत्यों से भाषण की स्वतंत्रता के उनके अधिकार को कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा संविधान में सभा करने और अपने विचार व्यक्त करने के अधिकार दिए गए हैं, लेकिन ये अधिकार निरंकुश नहीं हैं। अंतर्निहित उपयुक्त प्रतिबंधों के साथ इनका उपयोग किया जाना चाहिए।
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अदालत ने कहा सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि आरोपी ने स्वेच्छा से कार्यक्रम का आयोजन किया बल्कि सक्रिय रूप से भाग लिया और भड़काऊ भाषणों के विचारों और सामग्री को समर्थन प्रदान किया।
अदालत ने कहा आरोपी से एक फाउंडेशन के अध्यक्ष के रूप में यह उम्मीद की जाती है कि वह व्यापक हित में इस तरह के भड़काऊ विचारों को रोकता। वहीं आरोपी दूसरी ओर स्पष्ट रूप से अपने अन्य सहयोगियों के साथ भड़काऊ भाषणों में सक्रिय रूप से भाग लेते देखा गया है।
अदालत ने उसके उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि उसने किसी भी धर्म या समाज के किसी अन्य वर्ग के खिलाफ कोई शब्द नहीं कहा। अदालत ने कहा उस मामले में आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया पेश दस्तावेज से स्पष्ट है। अदालत ने उसके उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि उसके खिलाफ धारा 153-ए के तहत मामला नहीं बनता।
आरोपी ने तर्क दिया कि उसके खिलाफ धारा 153 ए को छोड़ कर अन्य अपराध जमानती हैं। याची ने कहा कि उसका संविधान पर पूरा विश्वास है और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते उसे पूरी तरह संज्ञान है कि कानून व्यवस्था के खिलाफ जाने के क्या परिणाम हो सकते हैं। वह समारोह में मात्र गांधी जी के भारत छोड़ो मूवमेंट कार्यक्रम में गया था। उसका नाम प्राथमिकी में नहीं है। उसे फर्जी मामले में फंसाया गया है ऐसे में जमानत प्रदान की जाए।
वहीं सरकारी वकील ने जमानत आवेदन पर विरोध जताते हुए कहा कि पेश वीडियो से स्पष्ट है कि आरोपी ने एक समुदाय विशेष के खिलाफ भाषण देकर लोगों को उकसाया। आरोपी ने दो समुदायों के बीच नफरत पैदा करने का प्रयास किया। अभी भी मामले में कई आरोपी फरार हैं।
इससे पहले कोर्ट ने मामले में भूपेंद्र तोमर उर्फ पिंकी चौधरी की ओर से दायर अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने भी पिंकी को जमानत देने से इनकार कर दिया है।
अदालत ने चौधरी को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि हम तालिबान राज्य नहीं हैं। हमारे बहुल और बहुसांस्कृतिक समाज में कानून के शासन पवित्र सिद्धांत है।