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दिल्ली के कारोबारी परेशान : बाजार में नहीं है सामान की मांग, फैक्टरियों में बंदी की नौबत

Thu, 22 Jul 2021 06:02 AM IST
दुष्यंत शर्मा किशन कुमार, नई दिल्ली
किशन कुमार, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 22 Jul 2021 06:02 AM IST
सार

  • बाजारों में घटी दिल्ली के माल की डिमांड
  • उत्तर प्रदेश और बिहार में बने उत्पाद दिल्ली की फैक्टरियों को दे रहे हैं टक्कर
  • 30 फीसदी हो रहा है उत्पादन, कारीगरों के पलायन से गुणवत्ता पर पड़ा असर
  • स्थानीय स्तर पर बनने से कीमत भी 10-15 फीसदी कम

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Businessmen of Delhi upset as there is no demand for goods in the market
पुराना सीलमपुर मार्केट... - फोटो : amar ujala

विस्तार

थोक बाजारों और औद्योगिक क्षेत्रों के अनलॉक होने के बाद भी दिल्ली की फैक्टरियों में बनने वाले सामान की मांग जोर नहीं पकड़ सकी है। आम दिनों की तुलना में इस वक्त फैक्टरियां औसतन सिर्फ 30 फीसदी क्षमता पर चल रही हैं। इसकी बड़ी वजह कोरोना काल में अपने घर वापस लौटे कारीगर हैं। दिल्ली की फैक्टरियों के उत्पादों को कीमत व गुणवत्ता के स्तर पर टक्कर उनसे मिली है, जिन्हें उत्तर प्रदेश व बिहार में स्थानीय स्तर पर कुशल कारीगर तैयार कर रहे हैं। कारोबारियों की मानें तो दूसरे प्रदेशों का सामान उन्हें 10-15 फीसदी कम कीमत पर मिल रहा है।

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कारोना काल से पहले दिल्ली के सभी बड़े थोक बाजारों के लिए उत्पादों की आपूर्ति पुराना सीलमपुर, कैलाश नगर, ब्रह्मपुरी, घोंडा, शाहदरा व जाफराबाद जैसे इलाके में स्थित छोटी-छोटी फैक्टरियों से होता था। उत्तर प्रदेश, बिहार समेत दूसरे राज्यों से कारीगर यहां बड़ी संख्या में काम करते थे। वर्षों के काम से वह पूरी तरह से प्रशिक्षित भी हो गए थे। कोरोना जनित लॉकडाउन ने इन कारीगरों को घर लौटने को मजबूर किया। बड़े स्तर पर हुआ पलायन त्रासदी से कम नहीं साबित हुआ है। दूसरी लहर की विनाश लीला और संभावित तीसरी लहर की आशंका ने इनमें से ज्यादातर कारीगरों को अपने-अपने गांवों व कस्बों में अभी तक रोके रखा है।
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कारीगरों के पलायन का असर अब दिल्ली की फैक्टरियों पर दिख रहा है। इस वक्त 30 फीसदी क्षमता पर इनमें काम हो रहा है। खास बात यह कि इनमें से ज्यादा कारीगर दिल्ली-एनसीआर के हैं। फैक्टरी मालिकों का कहना है कि इनकी मजदूरी ज्यादा होने के साथ यह पुराने कारीगरों जैसे कुुुशल भी नहीं हैं। स्थानीय अकुशल कारीगरों से ही अधिक दामों में काम करवाने को मजबूर हैं। इससे उत्पाद की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ा है।
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बंद होने लगी फैक्टरियां
फैक्टरी मालिकों का कहना है कि दिल्ली में बने माल पर जीएसटी लगता है और मजदूरी भी ज्यादा है। इससे कीमत बढ़ जाती है। दूसरी तरफ अपने घर पर काम कर रहे कुशल मजदूरों के साथ यह दिक्कत नहीं है। उनका सामान बेहतर होने के साथ सस्ता भी पड़ता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि बाजार खुलने के बाद भी दिल्ली के बनने वाले सामान की मांग ज्यादा नहीं है। इसकी जगह कारोबारी यूपी व बिहार से सामान मंगा रहे हैं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में पुराना सीलमपुर, घोंडा, ब्रह्मपुरी, शाहदरा समेत दूसरे इलाकों की फैक्टरियां न सिर्फ बंद हो रही हैं, बल्कि किरायेदारी पर उठने वाले मकान भी खाली हैं।

इसलिए पूर्वी और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में आते हैं कारीगर
दिल्ली के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी इलाके में प्रत्येक वर्ष उत्तर प्रदेश और बिहार समेत अन्य राज्यों से प्रवासी मजदूर आते हैं। कुशल कारीगरी का कौशल होने के कारण इन मजदूरों को यहां के फैक्टरी मालिक कम दरों पर काम पर रख लेते हैं। अनधिकृत कॉलोनियों में सस्ता किराया होने व फैक्टरियों से नजदीकी होने के कारण एक ही कमरे में पांच से अधिक लोग साझेदारी कर रहते हैं। कुछ जगहों पर फैक्टरी मालिकों और कारीगरों में सुबह-शाम के खाना और दिहाड़ी तय होती है। यही वजह होती है प्रवासी इन इलाकों में रहकर बड़े बाजारों के लिए कपड़ा तैयार करते हैं। 

बोले कारोबारी...
प्रवासी मजदूर अपने राज्य लौट गए हैं। वे बुलाने पर भी लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। इस वजह से स्थानीय स्तर पर करीब 30-40 फीसदी महंगे मजदूर मिल रहे हैं। इनके काम में भी पहले से कुशल प्रवासी मजदूरों के मुकाबले काफी अंतर है। मजबूरी में आगे भी कपड़ा महंगा बेचना पड़ता है, लेकिन इस वजह से करीब 60 फीसदी तक काम कम हो गया है। 
- सागर, कपड़ा फैक्टरी मालिक

तीसरी लहर को लेकर मन में चिंता बनी हुई है। दूसरी लहर के कारण फैक्टरी भी बंद हो गई है। फैक्टरी का किराया भी चढ़ रहा है, लेकिन रुपये नहीं होने के कारण किराया नहीं भर पा रहा हूं। पहले के मुकाबले बाजारों से कपड़े की मांग में भी कमी आ गई है। यदि लॉकडाउन की घोषणा होती है तो किराए की दुकान भी खाली करनी होगी।
- विक्रम जाटव, कपड़ा फैक्टरी मालिक

बाजार में कपड़े की मांग घट गई है। इस वजह से पहले का बचा हुआ माल ही बेचा जा रहा है। नए ट्रेंड को देखते हुए कपड़ा खरीदने के लिए भी पैसा नहीं बचा है। फैक्टरियों में काम आधा रह गया है। फैक्टरी का खर्चा और मजदूरों की दिहाड़ी देना भी संभव नहीं हो पा रहा है।
- श्याम सुंदर, कपड़ा फैक्टरी मालिक

फैक्टरी में पहले उत्तर प्रदेश और बिहार के करीब 10 मजदूर काम करते थे, लेकिन कोरोना और लॉकडाउन के कारण वह चले गए। अब तीन से चार मजदूर ही रह गए हैं। बाजार में मांग भी घट गई है। दुकान और फैक्टरी का किराया देना भी संभव नहीं हो पा रहा है। 
- दशरथ, कपड़ा व्यापारी

हमारी फैक्टरी में महिलाओं के कपड़े बनते हैं। बाजार में मांग घटने के बाद से फैक्टरी में से करीब छह मजदूर पलायन कर गए हैं। अब पहले के मुकाबले काम भी नहीं रह गया है। इस वजह से स्थानीय कारीगर ही माल तैयार हो रहे हैं। इससे माल को तैयार कराने में अधिक खर्चा भी लग रहा है।  

- कुलदीप, कपड़ा व्यापारी

कई फैक्टरियां और दुकानें बंद हो गई हैं। किराये से बचने के लिए अधिकतर कपड़ा व्यापारी घरों से ही काम कर रहे हैं। कुछ व्यापारियों पर मकानों का किराया चढ़ा हुआ है। इस वजह से दुकानदार और फैक्टरी मालिक भी यहां से दूसरी जगह तलाश कर रहे हैं, जिससे उन्हें कम दामों पर काम करने के लिए जगह मिल सके। 
- राजकुमार, दुकानदार
 

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