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Hindi News ›   Delhi ›   Attempt to murder is a heinous crime, it is not against an individual but against the society.

हत्या का प्रयास एक जघन्य अपराध, यह एक व्यक्ति नहीं बल्कि समाज के खिलाफ : हाईकोर्ट

Wed, 22 Sep 2021 01:14 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Wed, 22 Sep 2021 01:14 AM IST
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Attempt to murder is a heinous crime, it is not against an individual but against the society.
विजय सिंघल
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नई दिल्ली। हत्या का प्रयास एक जघन्य अपराध है और यह अपराध एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है बल्कि समाज के खिलाफ अपराध है। ऐसे अपराध में मुआवजा प्रदान कर समझौता करने की इजाजत प्रदान करने से समाज में गलत संदेश जाएगा। हाईकोट ने उक्त टिप्पणी करते हुए हत्या के प्रयास के आरोपी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य बड़े पैमाने पर लोगों की सुरक्षा और संरक्षण है। अदालत ने कहा ऐसा निर्णय न केवल अपराधी के लिए, बल्कि बड़े पैमाने पर उन व्यक्तियों के लिए एक सबक होगा ताकि ऐसे अपराध किसी के द्वारा नहीं किए जाए। पैसा समाज के खिलाफ किए गए अपराध का विकल्प नहीं है। आरोपी यह न समझे कि मुआवजा देकर मामले को सुलझा लिया जाएगा और उनके खिलाफ अपराध का सफाया हो गया है।
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पेश मामले में जाफरबाद इलाके में आरोपी मुख्तियार अली व उसके साथी हनान अदनान ने झगड़े में 2 अगस्त 20 को इमरान को चाकू मार कर घायल कर दिया था। हनन को अदालत ने भगोड़ा घोषित कर रखा है। वहीं याची के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि दोनों एक ही इलाके में रहते हैं और उनके मुवक्किल ने पीड़ित से समझौता करते हुए उसे तीन लख रुपये मुआवजा-चिकित्सा खर्च के अदा कर दिए हैं। ऐसे में प्राथमिकी रद्द की जाए। सरकारी पक्ष ने समझौते पर आपत्ति जताई।
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अदालत ने पुलिस के तर्क पर सहमति जताते हुए कहा कि वर्तमान जैसे गंभीर अपराध के बारे में नरम दृष्टिकोण रखना, आपराधिक न्याय प्रणाली के बारे में गलत धारणा छोड़ेगा और आगे आपराधिक कृत्यों को प्रोत्साहित करेगा, जो बड़े पैमाने पर समाज के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और कल्याण को खतरे में डालेगा। इतना ही नहीं इस न्यायालय द्वारा निर्णय के रूप में घोषित कानून उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत पालन करने के लिए बाध्यकारी मिसाल बन जाता है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 307 आईपीसी के तहत अपराध जघन्य अपराध की श्रेणी में है। इसलिए समाज के खिलाफ अपराध के रूप में माना जाना चाहिए न कि अकेले व्यक्ति के खिलाफ। ऐसे अपराध को केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता है कि पक्षों ने विवाद को आपस में सुलझा लिया है।

अदालत ने कहा पीड़ित को सर्जरी करानी पड़ी और उसे सर्जिकल आईसीयू में रखना पड़ा। इसके अलावा खून भी चढ़ाना पड़ा। आरोपी ने पीड़ित पर खतरनाक हथियार यानी चाकू से हमला किया गया है। पीड़ित की चोटें ऐसी थीं जो सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बनती। अदालत ने कहा कि यह पड़ोसियों के बीच एक साधारण लड़ाई नहीं है और आरोपी को तो धन्यवाद देना होगा कि वे हत्या के मामले में मुकदमे का सामना नहीं कर रहा क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में याचिकाकर्ताओं द्वारा की गई चोटें मौत का कारण बनने के लिए पर्याप्त है।
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