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हत्या का प्रयास : अदालत ने माना जघन्य अपराध, आरोपी की प्राथमिकी रद्द करने से इनकार

Wed, 22 Sep 2021 06:38 AM IST
दुष्यंत शर्मा विजय सिंघल, नई दिल्ली
विजय सिंघल, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 22 Sep 2021 06:38 AM IST
सार

न्यायमूर्ति सुब्रामण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य बड़े पैमाने पर लोगों की सुरक्षा और संरक्षण है।

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Attempt to murder: Court considered heinous crime
दिल्ली उच्च न्यायालय - फोटो : ANI

विस्तार

हत्या का प्रयास एक जघन्य अपराध है और यह अपराध एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है बल्कि ऐसे अपराध का असर बड़े पैमाने पर समाज के खिलाफ अपराध है। ऐसे अपराध में मुआवजा प्रदान कर समझौता करने की इजाजत प्रदान करने से समाज में गलत संदेश जाएगा। हाईकोर्ट ने उक्त टिप्पणी करते हुए हत्या के प्रयास के आरोपी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया। 

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न्यायमूर्ति सुब्रामण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य बड़े पैमाने पर लोगों की सुरक्षा और संरक्षण है। अदालत ने कहा ऐसा निर्णय न केवल अपराधी के लिए, बल्कि बड़े पैमाने पर उन व्यक्तियों के लिए एक सबक होगा ताकि ऐसे अपराध किसी के द्वारा नहीं किए जाए। पैसा समाज के खिलाफ किए गए अपराध का विकल्प नहीं है और आरोपी यह न समझे कि मुआवजा देकर मामले को सुलझा लिया जाएगा और उनके खिलाफ अपराध का सफाया हो गया है।
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पेश मामले में जाफरबाद इलाके में आरोपी मुख्तियार अली व उसके साथी हनान अदनान ने झगड़े में 2 अगस्त 20 को इमरान को चाकू मार कर घायल कर दिया था। हनन को अदालत ने भगौडा घोषित कर रख है। वहीं याची के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि दोनों एक ही इलाके में रहते है और उनके मुवक्किल ने पीड़ित से समझोता करते हुए उसे तीन लख रुपये मुआवजा-चिकित्सा खर्च के अदा कर दिए है। ऐसे में प्राथमिकी रद्द की जाए। सरकारी पक्ष ने समझोते पर आपत्ति जताई।
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अदालत ने पुलिस के तर्क पर सहमति जताते हुए कहा कि वर्तमान जैसे गंभीर अपराध के बारे में नरम दृष्टिकोण रखना, आपराधिक न्याय प्रणाली के बारे में गलत धारणा छोड़ेगा और आगे आपराधिक कृत्यों को प्रोत्साहित करेगा, जो बड़े पैमाने पर समाज के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और कल्याण को खतरे में डालेगा। इतना ही नहीं इस न्यायालय द्वारा निर्णय के रूप में घोषित कानून उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत पालन करने के लिए बाध्यकारी मिसाल बन जाता है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 307 आईपीसी के तहत अपराध जघन्य अपराध की श्रेणी में है और इसलिए समाज के खिलाफ अपराध के रूप में माना जाना चाहिए न कि अकेले व्यक्ति के खिलाफ। ऐसे अपराध को केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता है कि पार्टियों ने विवाद को आपस में सुलझा लिया है।


अदालत ने कहा पीड़िता को सर्जरी करानी पड़ी और उसे सर्जिकल आईसीयू में रखना पड़ा। इसके अलावा खून भी चढ़ाना पड़ा। आरोपी ने पीड़ित पर खतरनाक हथियार यानी चाकू से हमला किया गया है। पीड़ित की चोटें ऐसी होती हैं जो सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बनती। अदालत ने कहा कि यह पड़ोसियों के बीच एक साधारण लड़ाई नहीं है और आरोपी को तो धन्यवाद देना होगा कि वे हत्या के मामले में मुकदमे का सामना नहीं कर रहा क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में याचिकाकर्ताओं द्वारा की गई चोटें थीं मौत का कारण बनने के लिए पर्याप्त है।

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