पर्यावरण बचाने को इनका जुनून है काबिल-ए-तारीफ
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पर्यावारण दिवस पर अमर उजाला आपको ऐसे लोगों से रूबरू करवा रहा है, जिन्होंने पर्यावारण बचाने का भरपूर प्रयास किया है।
36 साल पहले देहरादून के सहस्त्रधारा में शौकिया तौर पर 101 पौधे लगाए। इसके बाद सिलसिला चल निकला। आज यह संख्या बढ़कर 4.85 लाख तक पहुंच चुकी है। जगदीश बाबला आज पर्यावरण संरक्षण में एक पहचाना हुआ नाम है। 60 साल की उम्र में भी उनका यह जुनून कम नहीं हुआ है।
जगदीश बाबला ने बताया कि वर्ष 1979 में उन्होंने सहस्त्रधारा में शौकिया तौर पर 101 पेड़ लगाए थे। इसके बाद छोटे छोटे अभियान चलाते रहे। 1983-84 में धौरण गांव में 27 हजार पौधे लगाए थे। गांव के सभी लोगों ने सपोर्ट किया। तीन महीने तक हर स्कूल से लगातार बच्चे पौधरोपण के लिए आते रहते थे।
1996-97 में दून से देवप्रयाग तक 15 दिन में 1.80 लाख पौधे लगाए थे। इसमें दून स्कूल की ओर से गाड़ी उपलब्ध कराई गई थी। पौधे लेते और रोपण करते जाते थे। 2001 में फिर जागरूकता अभियान के तहत देहरादून से हिंडोलाखाल तक पेड़ लगाते रहे। साथ ही कई जगहों पर पीपल और बरगद के बीज भी बोए।
3.20 लाख पौधे 2005 तक लगाए थे, जिसके बाद पांच जून 2008 उन्हें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय पर्यावरण पुरस्कार से नवाजा गया। जिला न्यायालय से मुंसिफ रिटायर्ड जगदीश का कहना है कि वह अब तक 4.85 लाख पौधे लगा चुके हैं। वह पर्यावरण संरक्षण के लिए हिमालय पर्यावरण सोसाइटी भी चलाते हैं।
शौक में बनाई पर्यावरण संरक्षण की राह
एक ओर जहां देहरादून कंक्रीट में बदलती जा रही है तो दूसरी ओर दून में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो कि अपने शौक के बहाने पर्यावरण की हिफाजत कर रहे हैं। वह न केवल वातावरण को हरा भरा बनाते हैं, बल्कि मेहनत से फल और सब्जियों का भी लाभ लेते हैं।
हॉबी भी, पर्यावरण संरक्षण भी
क्लेमेंटटाउन निवासी कर्नल सुरेश चंद त्यागी (सेवानिवृत्त) के घर में प्रवेश करते ही अलग प्राकृतिक अहसास होता है। 1993 में सेना से रिटायर होने के बाद कर्नल त्यागी ने अपने घर में ही बागवानी के शौक को आगे बढ़ाना शुरू किया। उन्होंने घर में खाली पड़ी जगह में आम, अमरूद, नींबू, लीची के अलावा सब्जियां उगानी शुरू कर दीं।
उनका कहना है कि इससे कई फायदे हैं। एक तो पर्यावरण संरक्षण होता है। दूसरे उन्हें ताजे फल और सब्जियां मिलती हैं और तीसरी बात यह है कि वह अपनी नई पीढ़ी को भी इसके प्रति जागरूक रखते हैं।
अशोक के पेड़ बनाए रक्षक
क्लेमेंटटाउन निवासी ले.जन. आनंद स्वरूप (सेवानिवृत्त) ने घर को वायु और ध्वनि प्रदूषण से बचाने के लिए बाउंड्री के आसपास अशोक के पेड़ लगाए हुए हैं। 86 वर्षीय आनंद स्वरूप ने बताया कि उनकी करीब चार बीघा जमीन है। इसमें उन्होंने लीची, आम, जामुन सहित कई फल और सब्जियां उगाई हुई हैं।
उन्होंने बताया कि उनका मकसद प्राकृतिक आवास में रहकर स्वस्थ रहना है। उन्होंने कहा कि सभी लोगों को मिलकर अपने घर में बागवानी करनी चाहिए। इससे उन्हें शुद्ध सब्जियां भी मिलेंगी और पर्यावरण भी बचेगा।
पर्यावरण के ‘पहरेदार’ यहां किए जा रहे तैयार
वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण पर लगातार बढ़ते प्रदूषण के दबाव को कुछ कम करने का तरीका खोज निकाला है। यहां के वैज्ञानिकों ने ऐसे खास पौधे तैयार किए हैं, जो कार्बन उत्सर्जन का ज्यादा शोषण करते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे पर्यावरण संरक्षण में काफी हद तक सहायता मिलेगी।तेजी से बढ़ रहे प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन ने पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा पैदा किया है। ऐसे में एफआरआई के वैज्ञानिकों ने इस समस्या से पार पाने के लिए इसी दिशा में शोध किए।
कड़ी मेहनत के बाद वैज्ञानिक पर्यावरण के ऐसे ‘पहरेदार’ तैयार करने में कामयाब हुए जो कार्बन का ज्यादा शोषण करते हैं। इसमें शीशम, यूकेलिप्टिस, मीलिया और बांस की कई ऐसी प्रजातियां तैयार कर ली गई हैं जो आम के पौधे के मुकाबले कई गुना ज्यादा तेजी से बढ़ती हैं और उतनी ही तेजी से कार्बन का शोषण करती हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे एक ओर जहां पौधे की ग्रोथ की दर में बढ़ोतरी हुई है, वहीं पर्यावरण संरक्षण में भी नई शुरुआत हुई है।
शाखा डाकपाल नहीं, पर्यावरण प्रहरी कहिए...
प्रवेश कुमारी/ अमर उजाला, हल्द्वानी
पर्यावरण बचाने केनाम पर मंचों से तीर छोड़ने वाले बयानवीरों के लिए किशन चंद एक सबक हैं। बागेश्वर के गांव मंडलसेरा के शाखा डाकपाल किशन चंद को अपनी जमीन, पेड़-पौधों से इतना लगाव है कि वह अब तक सवा तीन लाख से अधिक पौधे रोप, वितरित कर चुके हैं।
उनकी इन कोशिशों को उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकास्ट) ने सम्मान दिया है। कल पांच जून पर्यावरण दिवस के मौकेपर उन्हें देहरादून में परिषद के सभागार में विशेष सम्मान से नवाजा जाएगा। 18 साल की उम्र से परंपरागत बीजों केउत्पादन, संरक्षण से जुड़े किशनचंद की उम्र इस वक्त 48 साल है।
पेशे को ईमानदारी के साथ निभाने के साथ ही पौधों का वितरण, रोपण उनका जुनून है। एमबीए और बीफार्मा की पढ़ाई में जुटे उनके बेटे भी पिता के इस कार्य पर गर्व करते हैं।
देहरादून जाते हुए बुधवार रात हल्द्वानी में अमर उजाला से बात-चीत में किशनचंद ने सेवानिवृत्ति के पश्चात पूरा समय पर्यावरण रक्षा में देने की बात दोहराई।किशन को उनकी कोशिशों केलिए 2012 में गंगा स्पर्श बोर्डने भी सम्मानित किया है।
मां के नाम पर बनाई वाटिका
किशन चंद को मां देवकी देवी से अगाध लगाव है। यही वजह है कि उन्होंने अपनी दो बीघा जमीन में वाटिका लगाई तो उसका नाम देवकी देवी वृक्ष वाटिका रखा। इतना ही नहीं, उन्होंने नीलेश्वर धाम, कोटभ्रामरी में भी नंदा स्मृति वाटिका का निर्माण किया है।