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World Environment Day 2021 : शहरों से निकल रहा कचरा पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती

Sat, 05 Jun 2021 01:34 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 05 Jun 2021 01:34 PM IST
सार

उत्तराखंड के 91 नगर निगम, निकायों में कचरा प्रबंधन लगातार बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

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world environment day 2021 : garbage coming out from cities is a big challenge for environment
पीएफ कार्यालय के पास लगा कूड़े का ढेर - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

पर्यावरण के लिए शहरों से रोजाना निकलने वाला कचरा सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। दावे तमाम हैं, योजनाएं भी बन रही हैं लेकिन जमीन पर ठोस काम नहीं है। हालात यह हैं कि प्रदेश के शहरों से हर दिन 1551 मीट्रिक टन कचरा निकलता है, जिसमें से अभी केवल 60 फीसदी का ही निपटान होता है।

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उत्तराखंड के 91 नगर निगम, निकायों में कचरा प्रबंधन लगातार बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एक तो आबादी में बढ़ोतरी और दूसरा बाहर से आने वाले पर्यटकों की संख्या में इजाफा, दोनों से ही कचरे को बढ़ावा तो मिल रहा है लेकिन सरकार के स्तर से इसके निस्तारण को लेकर अपेक्षाकृत कम तेजी ही देखने को मिल रही है।
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शहरी विकास निदेशालय के अनुसार प्रदेश के 91 निगम, निकायों के सभी 1139 वार्डों से डोर-टु-डोर कूड़ा इकट्ठा किया जाता है। पूरे प्रदेश से रोजाना 1551 मीट्रिक टन कचरा निकलता है लेकिन इसमें से 60 फीसदी का ही निस्तारण हो पा रहा है। यानी करीब 930 मीट्रिक टन कचरा कहां जाता है, इसका कोई जवाब अधिकारियों के पास नहीं है।
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पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि निस्तारण से अलग जो कचरा बच रहा है, वह या तो नदियों-नहरों में डाला जा रहा है या फिर खुले में कहीं भी फेंक दिया जाता है। खुले में पड़ा हुआ कचरा पर्यावरण के लिए घातक है। एक ओर तो इसमें आग लगने की वजह से जो धुआं निकलता है, उसमें कई जहरीली गैस होती हैं तो दूसरी ओर नहरों-नदियों में फेंके जाने वाला कचरा बड़ा नुकसान पहुंचा रहा है।

कचरे से बिजली और तेल की योजना फाइलों में
शहरी विकास निदेशालय की कचरे से बिजली बनाने और कचरे से तेल निकालने की योजना कई सालों से फाइलों में है। वेस्ट टू एनर्जी का प्लांट रुड़की और वेस्ट टू ऑयल का प्लांट हरिद्वार में प्रस्तावित है।

उत्तराखंड करेगा दुनिया में सबसे पहले जीईपी की पहल
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का मार्ग सकल पर्यावरण उत्पाद(जीईपी) है। देश में अभी तक विकास को नापने का सूचक सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) है। लेकिन इसमें हवा, मिट्टी, पानी, जंगल कोई मतलब नहीं है। जीईपी को लेकर प्रदेेश सरकार का सकारात्मक है। जल्द ही उत्तरखंड दुनिया में सबसे पहले जीईपी की पहल करेगा। यह बात पर्यावरणविद् एवं हेस्को के अध्यक्ष पद्मविभूषण डॉ. अनिल जोशी ने कही।

उन्होंने कहा कि जिस पर विकास का पैमाना जीडीपी है। उसी तरह से पर्यावरण में जंगल, हवा, मिट्टी व पानी का आकलन जीईपी से किया जा सकता है। विकास व पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए जीईपी ही एक मार्ग है। देेश में विकास का सूचक जीडीपी है। लेकिन इसमें हवा, पानी, मिट्टी, जंगल का कोई मतलब नहीं है। जब हालात खराब होते हैं तब इस पर चर्चा होती है।

पानी खराब होने पर  बोतल बंद और फ्यूरीफाई  कर जीडीपी बढ़ जाती है। मिट्टी उर्वरक शक्ति खत्म होती है तो रसायन उद्योग लगते हैं। हवा प्रदूषित से लोग मरते हैं तो ऑक्सीजन का विकल्प है। जीडीपी यह नहीं बताती है कि हवा, मिट्टी, जंगल व पानी को कितना नुकसान हुआ है। नदियां सिकुड़ रही है और जंगलों का क्षेत्रफल कम हो रहा है।

प्रति वर्ष नदियों से बह जाने वाली उपजाऊ मिट्टी के आकलन से लेकर हवा के प्रदूषणों, ग्लेशियरों के पिघलने और वनों के बढ़ने व घटने संबंधी सूचनाएं संकलित कर इसका हिसाब रखा जाना चाहिए। पूरे देश में वन क्षेत्रफल 21 प्रतिशत है। जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 31 प्रतिशत है। वहीं, उत्तराखंड राज्य के कुल भू भाग का 71 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र का है। प्रदेेश् सरकार ने जीईपी को लेकर सकारात्मक पहल की है। जल्द ही उत्तराखंड दुनिया में सकल पर्यावरण उत्पाद की शुरूआत करने वाला पहला राज्य होगा।

जंगलों की बदहाली पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती

प्रदेश में मैती आंदोलन के प्रणेता पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने कहा कि जंगलों की विकृतता आने वाले समय में पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती है। राज्य बनने के बाद 21 साल भी एक मिश्रित जंगल तैयार नहीं कर पाए हैं। पर्यावरण को पानी देने वाले बांझ और मिश्रित वन चाहिए। पर्यावरण को बचाने की सिर्फ बातें हो रही है, यथार्थ में कुछ नहीं है।

रावत का कहना है कि कोविड महामारी से हमें यह सबक मिल गया कि धरती को किस तरह से संवार कर रखना है। कोरोना काल में नदियों का पानी स्वच्छ हो गया। आबोहवा में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा कम होने से हिमालय दिखाई देने लगा है। जितना हम प्रकृति से छेड़छाड़ कर उतने ही दुष्परिणाम झेलने होंगे।

पर्यावरण दिवस सिर्फ एक औपचारिकता के लिए सीमित है। नीति निर्माता पहाड़ के जंगल को नहीं समझ पाए। जंगलों ने जैव विविधतता को खो दिया है। जंगल अब इंसान के लिए लायक नहीं रहे। जंगलों में पानी देने वाले पेड़ खत्म हो रहे हैं। उसकी जगह चीड़ ने ले लिया है। एक हजार मीटर से ऊपर पेड़ कटाने पर प्रतिबंध है। पुराने पेड़ों से जंगल विकृत हो रहे हैं। प्रदेश में 27 प्रतिशत चीड़ के जंगल है, जबकि बांझ व मिश्रित जंगल 16 प्रतिशत है। वनाग्नि के लिहाज से चीड़ से सबसे घातक है। हमें ऐसे पेड़ों का जंगल खड़ा करने की जरूरत है जो पानी देने वाले हो और कार्बन डाई ऑक्साइड को ग्रहण करने वाले अधिक हो।

मधुमक्खियों के बिना खेती और मनुष्य के जीवन पर संकट
उत्तराखंड के जंगलों में हर साल लगने वाली आग और फसलों में कीटनाशकों के तेजी से बढ़ते उपयोग से कीटपतंगों और वन्य जीवों के प्राकृति वास बुरी तरह  प्रभावित हो रहे हैं। भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक खासकर मधुमक्खियों के स्वास्थ्य पर इसका हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है। यदि यही हाल रहा तो भविष्य में इससे खेती और मनुष्य के जीवन पर संकट खड़ा हो सकता है।

भारतीय वन्य जीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.वीपी उनियाल के मुताबिक मधुमक्खियों का खत्म होना पुरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। उत्तराखंड में जंगलों में आग से वन्य जीव, जंतुओं के प्राकृतिक वास बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि संस्थान की ओर से पोलीनेटरों पर हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में अध्ययन किया गया। जिसमें पता चला कि सेब की फसल में कीटनाशकों के तेजी से बढ़ते उपयोग से हिमाचल में मधुमक्खियों के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा है। हालांकि लद्दाख और पिथौरागढ़ जिले में स्थिति कुछ बेहतर है।

हिमाचल में अच्छी सेब की प्रजाति के लिए छह बार कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है। फूल खिलने पर स्प्रे, फल लगने पर स्प्रे से लेकर उसके बाजार में पहुंचने तक उस पर स्प्रे किया जा रहा था। इससे हुआ यह कि पोलीनेटर (परागण सहयोगी) सहयोगी खत्म हो गए और पेड़ों में फल नहीं लगा। जबकि पिथौरागढ़ और लद्दाख में कीटनाशकों का उतना उपयोग नहीं किया गया। इसके अलावा यूपी में गौरैया पर अध्ययन से पता चला कि पक्के मकान और मानव जीवन में खाद्य पदार्थो को लेकर आए बदलाव से गौरैया के वास स्थल प्रभावित हुए हैं। वहीं उसके लिए भोजन का संकट खड़ा हो गया है।  उन्होंने कहा कि अब जुगनू भी पहले की तरह देखने को नहीं मिलते। संस्थान की छात्रा निधि राणा की ओर से इस पर शोध किया जा रहा है।

फसलों को जीवित रखती हैं मधुमक्खियां
वैज्ञानिकों के मुताबिक कृषि के अस्तित्व के लिए मधु मक्खिया जरूरी हैं। वे पौधों और फसलों को जीवित रखती हैं। खासकर वह बादाम, खेब, खुबानी, काजू, कॉफी, खीरे, अंगूर, कीवी, आम, भिंडी, अखरोट व इसके अलावा भी अन्य कई फसलों को परागित करती हैं।

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