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विश्व पर्यावरण दिवस 2019 : खतरनाक स्तर पार कर गया है देहरादून में कई जगह के प्रदूषण का स्तर

Wed, 05 Jun 2019 01:19 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Wed, 05 Jun 2019 01:19 PM IST
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World Environment day 2019 in dehradun many place pollution crossed dangerous level
प्रतीकात्मक - फोटो : PTI

वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि राजधानी दून में आईएसबीटी क्षेत्र में पीएम (पार्टिकुलेट मेटर)-10 का स्तर 300 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच गया है। जबकि निर्धारित मानकों के अनुरूप यह 60 माइक्रोग्राम होना चाहिए। साल 2011 में कराए गए सर्वे में आईएसबीटी के पास वायु प्रदूषण का स्तर 138 माइकोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर और साल 2017 में 287 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर मापा गया था। जो वर्तमान में 300 के आसपास है।

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42 फीसदी प्रदूषण का कारण बाहरी 
देवभूमि खासकर राजधानी दून में वायु प्रदूषण खतरनाक होने के कारण पर वैसे तो कोई ‘सोर्स एस्पोरेशन स्टडी’ नहीं कराई गई है, लेकिन पूर्व में कराए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि दून की आबोहवा को बिगाड़ने में 42 फीसदी योगदान यूपी की आबोहवा का है। जबकि सफाईकर्मियों और आम शहरियों द्वारा खुले में कूड़ा करकट जलाए जाने से 20 फीसदी असर पड़ रहा है। वहीं 14 फीसदी गाड़ियों व 14 फीसदी घरों में जलाए जाने वाले चूल्हे से प्रदूषण प्रभावित हो रहा है।
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नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम से सुधरेगी स्थिति
सवाल उठता है कि देश में साल दर साल खराब हो रहे प्रदूषण को कैसे सुधारा जा सकता है। इसके लिए केंद्र सरकार ने ‘नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम’ एनसीएपी की शुरुआत की है। योजना के तहत देश के 102 चुनिंदा शहरों को पहले चरण में चुना गया है। जिसमें उत्तराखंड के दो शहर ऋषिकेश और काशीपुुर शामिल हैं। जबकि देहरादून को सूची से बाहर कर दिया गया है। वहीं पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश के सात शहरों को योजना मेें शामिल किया गया है। राज्य सरकार का यह प्रयास होना चाहिए कि वह देहरादून को भी योजना में शामिल कराने को लेकर पहल करें। योजना के तहत अगले पांच साल में इन चयनित शहरों के प्रदूषण स्तर में 35 फीसदी की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है। सत्ताधारी भाजपा ने इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल किया है। लोकसभा चुनाव के दौरान दावा किया गया था कि यदि केंद्र में भाजपा की सरकार बनेगी तो इसे मिशन मोड में चलाया जाएगा।
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प्रदेश में महज छह शहरों में हो रही वायु प्रदूषण की मॉनीटरिंग

उत्तराखंड में महज छह शहरों देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, हल्द्वानी, काशीपुर और रुद्रपुर में वायु प्रदूषण की मॉनीटरिंग की जा रही है। राजधानी देहरादून में आईएसबीटी, घंटाघर और राजपुर में मॉनीटरिंग सेंसर लगाए गए हैं। जबकि बाकी शहरों में सिर्फ एक-एक सेंसर से मॉनीटरिंग की जा रही है। आंकड़ाेें पर नजर डालें तो एक करोड़ की आबादी पर महज आठ सेंसर लगाए गए हैं। जबकि इसके विपरीत पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में 60 लाख की आबादी के लिए 17 मॉनीटरिंग सेंसर स्थापित किए गए हैं।
 
वायु प्रदूषण से हर साल 80 लाख लोग गवां रहे जिंदगी
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में वायु प्रदूक्षण से होने वाली बीमारियों के चलते 80 लाख लोग हर साल जिंदगी गवां रहे हैं। जहां तक देश का सवाल है तो भारत में हर साल 12 लाख लोग वायु प्रदूषण के चलते जिंदगी गवां रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में 92 फीसदी लोगों को निर्धारित मानकों के विपरीत हवा मिल रही है, जो चिंताजनक पहलू है।

सबसे खतरनाक 15 शहरों में देश के 14 शहर
साल 2018 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 15 सबसे अधिक प्रदूषित शहराें में 14 शहर भारत के शामिल हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन शहरों में सभी शहर उत्तर भारत के शामिल हैं। इनमें एक हिमालयी क्षेत्र में स्थित श्रीनगर भी शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत प्रदूषण के मामले में पूरी दुनिया में पहले स्थान पर है। इससे पहले चीन पहले नंबर पर था, लेकिन चीन ने कई कठोर कदम उठाकर प्रदूषण पर काफी हद तक काबू पा लिया है।

राज्य के 81 नगर निकायों में प्रतिदिन निकल रहा 275 टन प्लास्टिक कचरा

देश-दुनिया में साल दर साल तेजी से फैल रहे प्रदूषण को कम करने को लेकर जहां पूरी दुनिया मेें गहरी चिंता जताई जा रही है और प्रदूषण को कम करने को लेकर तमाम एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं, वही देवभूमि में प्रदूषण को लेकर भयावह तस्वीर सामने आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते तमाम एहतियाती कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति बेहद खराब हो सकती है, जिससे पार पाना आसान नही होगा। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से साल 2017 में कराए गए सर्वे के आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य के 81 नगर निकाय क्षेत्रों में प्रतिदिन औसतन 1600 टन कचरा इकट्ठा हो रहा है। इसके निस्तारण को लेकर किसी भी नगर निकाय के पास कोई माकूल व्यवस्था नहीं है।

चौंकाने वाली बात यह है कि नगर निकाय क्षेत्रों में निकलने वाले कूड़े करकट में 17 फीसदी प्लास्टिक कचरा शामिल है, जो प्रतिदिन औसतन 275 टन है। उल्लेखनीय पहलू यह भी है कि इस प्लास्टिक कचरे के निस्तारण को लेकर कोई माकूल व्यवस्था किसी भी नगर निकाय के पास नहीं है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में एक किलोग्राम प्लास्टिक कचरे को इकट्ठा करने के लिए औसतन प्रतिदिन 40 रुपये का खर्च आएगा। जबकि मध्य हिमालयी क्षेत्रों में यह 20 रुपये है। वहीं, राज्य के पर्यटन स्थलों मसूरी और नैनीताल में प्लास्टिक कचरे के निस्तारण पर प्रति किलोग्राम 12 रुपये का खर्च आ रहा है। नियंत्रण बोर्ड के सर्वे में बात भी सामने आई है कि पूरे राज्य में पर्वतीय इलाकों में जो भी प्लास्टिक कचरा फेंका जा रहा है, वह राज्य के तमाम प्राकृतिक जल स्रोतों को चोक कर रहा है, जिसके घातक परिणाम भी सामने आने शुरू हो गए हैं। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव एसपी सुबुद्धि की मानें तो राज्य में तमाम जगहों पर प्लास्टिक कचरे को खुले में जलाया जा रहा है, जिससे वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर की ओर बढ़ रहा है।

देश में प्रति व्यक्ति इस्तेमाल हो रहा 9.7 किग्रा प्लास्टिक

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक सर्वे के मुताबिक देश के 60 बड़े शहरों में हुए सर्वे में यह बात सामने आई है कि पूरे देश में प्रतिदिन 25 हजार 940 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर साल प्रति व्यक्ति 9.7 किग्रा प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है, जो बाद में कचरे के रूप में तब्दील होता है। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक राहत देने वाली बात यह है कि देश में निकलने वाले प्लास्टिक कचरे में से 94 फीसदी कचरे को रिसाइकिल किया जा सकता है। जबकि छह फीसदी प्लास्टिक कचरे को रिसाइकिल नहीं किया जा सकता।

पर्यटक ज्यादा फैला रहे प्लास्टिक कचरा
उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि देवभूमि में जो भी कचरा फैलाया जा रहा है, उसमें राज्य में आने वाले करोड़ों पर्यटकों का योगदान अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में आने वाले करोड़ों पर्यटक अपने साथ हर साल कई टन प्लास्टिक का सामान लाते हैं जो यूं ही खुले में कहीं भी फेंक कर चले जाते हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव एसपी सुबुद्धि के मुताबिक इस दिशा में जल्द ही जागरुकता अभियान चलाने की जरूरत है, ताकि राज्य में आने वाले पर्यटकों को प्लास्टिक के कचरे से होने वाले नुकसान के बारे में अवगत कराया जा सके।

इस बार ‘बीट एयर पॉल्यूशन’ है थीम
विश्व पर्यावरण दिवस पर इस बार की थीम ‘बीट एयर पॉल्यूशन’ रखी गई है। जबकि साल 2017 में विश्व पर्यावरण दिवस की थीम ‘कनेक्टिंग पीपुल विद नेचर’ और साल 2018 में थीम ‘बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन’ रखी गई थी। साल 2018 में भारत आयोजक देश था, जबकि साल 2019 में चीन को आयोजक देश का दर्जा मिला है। विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत साल 1974 में की गई थी। पूरी दुनिया इस साल 45वां विश्व पर्यावरण दिवस मना रही है।

दून की सड़कों पर जरूरत से ज्यादा शोर

किसी जमाने में सेहत व पर्यावरण के लिहाज से बेहद सुरक्षित समझे जाने दून शहर का पर्यावरण स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंचने को आमादा है। शहर में तेजी से हो रहे विकास और बढ़ती आबादी के साथ ही वायु और ध्वनि प्रदूषण का स्तर भी तेजी से बढृ रहा है, जो खतरनाक पहलू है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक शहर के बीचो-बीच स्थित सर्वे चौक, घंटाघर और सीएमआई चौक का ध्वनि प्रदूषण स्तर सामान्य से 12 फीसदी अधिक बढ़ गया है।

उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य दिनों में सर्वे चौक में ध्वनि प्रदूषण का स्तर 72 डेसीबल पाया गया है जो निर्धारित मानक 65 से 7 डेसीबल अधिक है। इसी प्रकार व्यावसायिक क्षेत्र सीएमआई चौक में कराए गए सर्वे के मुताबिक ध्वनि प्रदूषण का स्तर औसतन 75.43 डेसीबल पाया गया, जो निर्धारिक मानक 65 से 10.43 डेसीबल अधिक है। इतना ही नहीं दून अस्पताल जैसे साइलेंट जोन में भी स्थिति कुछ ठीक नहीं मिली। सर्वे के मुताबिक दून अस्पताल के आसपास ध्वनि प्रदूषण का स्तर औसतन 55 डेसीबल पाया गया, जो निर्धारित मानक 50 से पांच डेसीबल अधिक है। शहर के व्यस्ततम इलाके सीएमआई चौक में स्थिति और खराब पाई गई है। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक सीएमआई क्षेत्र का ध्वनि प्रदूषण स्तर औसतन 74.19 डेसीबल पाया गया, जो निर्धारित मानक 65 से 9.19 डेसीबल अधिक है।

बोर्ड की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक दून जैसे साइलेंट जोन में जहां रात के समय ध्वनि प्रदूषण का स्तर 40 डेसीबल होना चाहिए, यह औसतन 55 डेसीबल का आंकड़ा पार कर रहा है जो खतरनाक है। विशेषज्ञों का कहना है कि गाड़ियों में लगे प्रेशर हार्न पर प्रतिबंध व अस्पतालों के आसपास गाड़ियों का संचालन कम करके अस्पतालों के पास काफी हद तक ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

पूरी दुनिया में जिस तरीके से प्रदूषण तेजी से खराब हो रहा है। उसे देखते हुए यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो हमारी आने वाली पीढ़ियाें को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। प्रदूषण संरक्षण के प्रति हरेक व्यक्ति को जागरूक होना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया के सामने गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा, जिससे निपटना आसान नहीं होगा।
- जयराज, प्रमुख वन संरक्षक, वन विभाग

जिस तरीके से राजधानी में जनसंख्या बढ़ने के साथ ही विकास कार्यों व गाड़ियों की संख्या में तेजी आई है, उसे देखते हुए प्रदूषण का स्तर बढ़ना लाजिमी है। लेकिन अभी स्थिति नियंत्रण में है। समय रहते एहतियाती कदम उठाकर ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है।
- एसपी सुबुद्धि, सदस्य सचिव, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 

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