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विश्व पर्यावरण दिवस: यूरोपीय देशों के प्रदूषण से बिगड़ रही हिमालय की पारिस्थितिकी,शोध में हुआ खुलासा

Wed, 05 Jun 2019 08:08 AM IST
अलका त्यागी अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Wed, 05 Jun 2019 08:08 AM IST
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world environment day 2019 European countries pollution effect Himalayan Ecosystem
- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर

दुनिया में तेजी से खतरनाक स्तर पर पहुंच रहे प्रदूषण का असर इंसानों की जिंदगी पर तो दिखाई दे ही रहा है। साथ ही सालभर बर्फ से आच्छादित पर्वत भी प्रदूषण से अछूते नहीं रह गए हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की ओर से किए गए हालिया शोध में यह बात सामने आई है कि यूरोपीय देशों में बढ़ते प्रदूषण का असर हिमालयी देशों के पर भी दिखाई देने लगा है। वैज्ञानिकों के शोध में यह बात सामने आई है कि पश्चिमी विक्षोभ के जरिये भारी मात्रा में कार्बन हिमालयीय क्षेत्रों में पहुंच रहा है। जिसका असर हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ रहा है।

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पश्चिमी विक्षोभ के साथ ही देश में प्रदूषण स्तर में आ रहे बदलाव के चलते हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहे प्रभाव का अध्ययन करने को लेकर हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की ओर से गंगोत्री ग्लेशियर के निकट चीड़बासा व भोजबासा में दो मानीटरिंग स्टेशन की स्थापना की गई है, जिसके जरिए हिमालयी क्षेत्रों में कार्बन समेत अन्य गैसों के प्रभावोें का अध्ययन किया रहा है। शोध में जुटे वैज्ञानिकों का दावा है कि उच्च हिमालयीय क्षेत्रों में कार्बन की मात्रा बढ़ रही है जो चौंकाने वाली बात है। यह पहली बार है जब संस्थान के वैज्ञानिकों ने उच्च हिमालयीय क्षेत्रों में कार्बन की बढ़ती मात्रा का अध्ययन किया है।

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0.1 से चार माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक मापी गई मात्रा

वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के मुताबिक पिछले एक साल के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि पश्चिमी विक्षोभ के चलते उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कभी कार्बन का स्तर 0.1 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तो कभी चार माइक्रोग्राम तक मापा गया है। बारिश के दौरान कार्बन की मात्रा कम पाई गई है। वैज्ञानिकोें के मुताबिक कार्बन की मात्रा कम करने के लिए नीतियां बनानी हाेंगी।

कार्बन की मात्रा बढ़ने से तेजी से पिघलेंगे ग्लेशियर 
संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि उच्च हिमालयीय क्षेत्रों में यदि कार्बन समेत अन्य गैसों की मात्रा तेजी से बढ़ेगी तो इसका असर ग्लेशियरों पर पड़ेगा। इस क्षेत्र में मौजूद कार्बन सूर्य की गर्मी को अवशोषित करने के साथ ही बाद में तेजी से बाहर निकालेंगे। परिणामस्वरूप ग्लेशियरों के पिघलने की गति में तेजी आएगी और उनका क्षेत्रफल भी सिकुड़ेगा।

आखिर कैसे बचेगी पृथ्वी

वाडिया इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी का कहना है कि पृथ्वी पूरे ब्रह्मांड मेें अकेला ग्रह है, जिस पर जीवन है। कल्पना की जा रही है कि ब्रह्मांड में कई अन्य ग्रहों पर जीवन है लेकिन अभी तक इसके ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं। यदि पृथ्वी को बचाना है तो ओजोन पर्त को तहस-नहस होने से बचाना होगा। पूरी दुनिया में अधिक से अधिक वनीकरण करने के साथ ही तेजी से सूख रही नदियाें का संरक्षण करना होगा। प्रदूषण कम करने को लेकर पूरी दुनिया में ठोस कदम उठाने होंगे। जलवायु परिवर्तन के खतरों से तेजी से निपटना होगा।

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कार्बन की मात्रा बढ़ रही है जो खतरनाक पहलू है। यूरोपीय देशों में तेजी से खतरनाक हो चुका प्रदूषण इसकी वजहों में से एक है। पश्चिमी विक्षोभ के जरिये कार्बन की भारी मात्रा हिमालयीय क्षेत्रों में पहुंच रही है। यदि समय रहते इसे रोकने को लेकर कारगर ठोस नीतियां नहीं बनाई गई तो हिमालयीय क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ने का नतीजा सबको भुगतना होगा।
- डॉ. पीएस नेगी, वरिष्ठ वैज्ञानिक, हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी 

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