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विश्व दिव्यांग दिवस पर विशेष: गीता सोनी के ज्ञान से संवर रही कईं जिंदगियां

Fri, 03 Dec 2021 04:35 PM IST
अलका त्यागी संवाद न्यूज एजेंसी, देहरादून
संवाद न्यूज एजेंसी, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 03 Dec 2021 04:35 PM IST
सार

तीन साल की उम्र में पोलियो अटैक आने के बाद गीता सोनी की जिंदगी कई उतार-चढ़ाव से गुजरी। कई बार समाज से दुत्कार मिली, लेकिन गीता ने अपनी दिव्यांगता को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिए।

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World disability day 2021: Many People have been Fine by  therapy treatment of Geeta Soni
गीता सोनी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कभी महक की तरह हम गुलों से उड़ते हैं, कभी धुएं की तरह पर्वतों से उड़ते हैं। ये कैचियां हमें उड़ने से खाक रोकेंगी, की हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं...। दिव्यांगता को चुनौती देते हुए इसी हौसले के साथ डॉ. गीता सोनी ने सिर्फ अपना ही जीवन नहीं संवारा बल्कि कई बच्चों को भी नया जीवन दे रही हैं। खुद को मजबूत बनाने के लिए गीता ने सबसे पहले अपनी शिक्षा को मजबूत करने की ठानी और आज उसी शिक्षा से गीता दिव्यांग बच्चों को नई उम्मीद दे रही हैं। 

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तीन साल की उम्र में पोलियो अटैक आने के बाद गीता सोनी की जिंदगी कई उतार-चढ़ाव से गुजरी। कई बार समाज से दुत्कार मिली, लेकिन गीता ने अपनी दिव्यांगता को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिए। बकौल गीता, पोलियो के कारण मुझे चलने में दिक्कत होती थी। मेरे पड़ोस के कुछ बच्चे मेरे चलने का मजाक उड़ाते थे। मैं बहुत रोती थी।
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मुझे बहुत अलग तरीके से देखा जाता था। बहुत लंबे समय तक मैं इस माहौल के कारण परेशान रही, लेकिन मैं इसी तरह अपना जीवन नहीं गुजारना चाहती थी। इसलिए मैंने सबसे पहले अपनी शिक्षा को मजबूत करने की ठानी।
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अपनी पढ़ाई पूरी की। मैंने स्पीच थैरेपी और ऑडियोलॉजी में कोर्स किया। दिल्ली में गीता को अली यावर जंग राष्ट्रीय वाक एवं श्रवण दिव्यांगजन संस्थान में स्पीच थेरेपिस्ट की नौकरी भी मिल गई, लेकिन तीन साल बाद ही गीता ने नौकरी छोड़ दी। 

दिव्यांग बच्चे को देखकर उन्हें अपना बचपन याद आता था

गीता ने बताया कि दिव्यांग होना समाज में आपको कैसा महसूस कराता है, यह वह जानती थी। इसलिए वह दिव्यांग बच्चों के लिए कुछ करना चाहती थी। गीता ने बताया कि दिव्यांग बच्चे को देखकर उन्हें अपना बचपन याद आता था। इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़ दिव्यांग बच्चों की जिंदगी संवारने की ठानी।

स्पीच थैरेपी और ऑडियोलॉजी के जरिये वह लगभग एक हजार से अधिक बच्चों को इलाज कर चुकी हैं। गीता मूलरूप से यूपी से हैं। 2003 में वह दून आईं और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों एवं दिव्यांगों के लिए स्पीच थैरेपी, ऑडियोलॉजी एवं विशेष शिक्षा का सेंटर शुरू किया। उन्हें कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। 

दिव्यांगों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण और उपेक्षा के कारण सामाजिक चुनौतियां जटिल हो जाती हैं। शारीरिक या मानसिक निशक्तता और सामाजिक रवैये के कारण समाज की मुख्य धारा के साथ कदमताल करने में दिव्यांग खुद को कमतर महसूस करते है। जीवन निर्वहन में कदम-कदम पर कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में दिव्यांगों का सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर और स्वावलंबी  होना आवश्यक है। इसलिए उन्हें सामान्य शिक्षा के स्थान पर विशिष्ट शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है। मुझे मेरे परिवार का सहयोग मिला, लेकिन हर दिव्यांग को यह नहीं मिलता। उन्हें भी एक सामान्य जीवन जीने का हक है।
- डॉ. गीता सोनी, स्पीच थेरेपिस्ट

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