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जिन्हें समझा बेकार, वही बने गले का हार
ब्यूरो / अमर उजाला, पौड़ी
Updated Sat, 31 Jan 2015 03:29 PM IST
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पहाड़ में रोजगार के अभाव का राग अलापकर पलायन कर रहे युवाओं के लिए अखिलेश प्रेरणास्रोत हैं।
उत्तराखंड के अखिलेश ने अनुपयोगी वायर, लकड़ी और पेपरों को तराशकर आर्टिफिशियल जेवरात तैयार करने को स्वरोजगार का जरिया बनाया है। गहड़ गांव निवासी अखिलेश मणी बताते हैं कि हस्तकला का उन्हें बचपन से शौक था।
जेवरात के नमूने वेबसाइट पर
छह साल पहले उन्होंने अपने बड़े भाई अमित मणी की प्रेरणा से अनुपयोगी लकड़ी, पेपर और पत्थरों से आर्टिफिशियल जेवरात बनाने का प्रयास शुरू किया। इसमें विशेषज्ञता हासिल करने पर इसको रोजगार का जरिया बनाने का फैसला लिया। खुद तैयार किए आर्टिफिशियल जेवरात के नमूनों को अपनी वेबसाइट डाला।
उसके बाद देहरादून, दिल्ली और राजस्थान से मांग आनी शुरू हुई। वर्तमान में वह लकड़ी, पत्थर, अनुपयोगी वायर से इयर रिंग, फिंगर रिंग, ब्रासलेट, माला समेत कई जेवरात तैयार करते हैं। उन्होंने इस काम में 13 अन्य लोगों को भी शामिल किया है। अखिलेश बताते हैं कि एक वर्ष में उन्होंने करीब 16 लाख का कारोबार किया।
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नेचुरल आर्टिफिशियल जेवरातों को ज्यादातर ऊंचे तबके के लोग पसंद करते हैं। देहरादून, दिल्ली और राजस्थान के बड़े शहरों से इसकी काफी मांग है। विदेशों से भी कई लोग आर्टिफिशियल जेवरात मंगा रहे हैं।
- अखिलेश
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उत्तराखंड के अखिलेश ने अनुपयोगी वायर, लकड़ी और पेपरों को तराशकर आर्टिफिशियल जेवरात तैयार करने को स्वरोजगार का जरिया बनाया है। गहड़ गांव निवासी अखिलेश मणी बताते हैं कि हस्तकला का उन्हें बचपन से शौक था।
जेवरात के नमूने वेबसाइट पर
छह साल पहले उन्होंने अपने बड़े भाई अमित मणी की प्रेरणा से अनुपयोगी लकड़ी, पेपर और पत्थरों से आर्टिफिशियल जेवरात बनाने का प्रयास शुरू किया। इसमें विशेषज्ञता हासिल करने पर इसको रोजगार का जरिया बनाने का फैसला लिया। खुद तैयार किए आर्टिफिशियल जेवरात के नमूनों को अपनी वेबसाइट डाला।
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उसके बाद देहरादून, दिल्ली और राजस्थान से मांग आनी शुरू हुई। वर्तमान में वह लकड़ी, पत्थर, अनुपयोगी वायर से इयर रिंग, फिंगर रिंग, ब्रासलेट, माला समेत कई जेवरात तैयार करते हैं। उन्होंने इस काम में 13 अन्य लोगों को भी शामिल किया है। अखिलेश बताते हैं कि एक वर्ष में उन्होंने करीब 16 लाख का कारोबार किया।
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नेचुरल आर्टिफिशियल जेवरातों को ज्यादातर ऊंचे तबके के लोग पसंद करते हैं। देहरादून, दिल्ली और राजस्थान के बड़े शहरों से इसकी काफी मांग है। विदेशों से भी कई लोग आर्टिफिशियल जेवरात मंगा रहे हैं।
- अखिलेश