...ये बच्चे करते हैं चौंकाने वाले काम
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वंडर गर्ल के तौर पर देशभर में जानी जा रही श्लोका को तो आपने टीवी पर देखा ही होगा। याद है न, कैसे श्लोका आंखों पर मोटी पट्टी बांधकर चीजों को छूकर, सूंघकर उनका रंग या उन पर लिखे शब्द पढ़ लेती है।
इसी तरह देहरादून के ये बच्चे भी अपनी इंद्रियों को जाग्रत कर श्लोका की तरह लोगों को चौंका रहे हैं। दून के चार वंडर किड्स भी वंडर गर्ल की तरह आंखें बंद कर किताब पढ़ते हैं, तस्वीरों के रंग बताते हैं, चेस खेलते हैं और तो और कंप्यूटर भी ऑपरेट कर लेते हैं। ये वंडर किड्स हैं अर्णव, शानवी, शाश्वत और आकृति।
माई स्टेप अहेड प्राइवेट लिमिटेड की ओर से राजपुर रोड स्थित एक होटल में दस दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में इन चारों बच्चों को न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्राम (एनएलपी) की खास ट्रेनिंग दी गई। गुरुवार को चारों बच्चे मीडिया से मुखातिब हुए तो वे आचारों में ऐसे जादुई गुण विकसित हो चुके थे, जो उन्हें आम बच्चों से अलग करते हैं।
एनएलपी (न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्राम) ट्रेनर राम वर्मा ने बताया कि देश में प्रोग्राम के 100 से अधिक सेंटर हैं। बताया कि 29 और 30 नवंबर को दून में वर्कशॉप की जाएगी। इस मौके पर राहुल सिंह, राजा डोगरा आदि उपस्थित रहे।
यह है एनएलपी
एनएलपी यानी न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्राम के ट्रेनर राम वर्मा ने बताया कि बेसिकली यह प्रोग्राम मानव मस्तिष्क को साधने की कला है। बताया कि दिमाग ब्लाक में बंटा हुआ होता है। हर ब्लाक अलग तरह से काम करता है।
दिमाग का मध्य भाग (मिड ब्रेन) सूचनाओं के संकलन, समझने के लिहाज से सबसे शक्तिशाली माना जाता है। लेकिन नब्बे फीसदी लोग दिमाग के इन ब्लाकों को अपने हिसाब से कोआर्डिनेट नहीं कर पाते।
एलएनपी के जरिये मिड ब्रेन को ही साधा जाता है। वर्मा के मुताबिक खास क्रियाओं के जरिये तय किया जा सकता है कि दिमाग एक खास प्रोग्राम के हिसाब से काम करे।
ऐसे देते हैं ट्रेनिंग
वर्मा बताते हैं कि यह प्रोग्राम साढ़े चार साल से 12 वर्ष आयु तक के बच्चों पर सबसे अधिक कारगर है। इसकी वजह यह है कि उनका दिमाग विकसित होने के दौर में रहता है और वयस्कों की तरह उसमें भाषाओं को पढ़ने, समझने, चीजों को देखने, जानने के लिए फिक्स फारमेट नहीं होते।
बताया कि एनएलपी के जरिये यह तय किया जाता है कि बच्चों का दिमाग किस लैंग्वेज (देखने, सुनने, समझने का तरीका) पर काम कर सकता है। प्रोग्राम में आने वाले बच्चों को पहले हर तरह से रिलैक्स किया जाता है, ताकि वे भटकें नहीं। इसके बाद बारी आती है ब्रेन को एक्टिवेट करने की।
खास तरह के संगीत की मदद से बच्चों का दिमाग जाग्रत किया जाता है। इसके बाद बारी आती है बच्चों को लैंग्वेज कमांड से जोड़ने की। इसके तहत उन्हें आंखें बंद कर चीजों को पहचानने, सूंघकर रंग, तस्वीरों की पहचान करने की ट्रेनिंग दी जाती है।
इंद्रियों पर खास ध्यान
वर्मा बताते हैं कि कुदरत ने मानव शरीर को पांच इंद्रियां आंख, नाक, कान, त्वचा और जीभ दी हैं। इन पांचों की मदद से ही मनुष्य देखकर, छूकर, सूंघकर, सुनकर और स्वाद लेकर चीजों की पहचान कर पाता है। लेकिन आमतौर पर लोग इनका सामान्य उपयोग ही करते हैं।
वर्मा के मुताबिक इंद्रियों को ध्यान के जरिये जाग्रत किया जाए तो ये एक-दूसरे की पूरक बन जाती हैं। आंखें बंद हों तो सूंघकर ही चीज का पता लगाया जा सकता है। यही एनएलपी में सिखाया जाता है।
यह है फायदा
- मानसिक तनाव होता है दूर
- बच्चों में एकाग्रता बढ़ती है
- स्मरण शक्ति में होती है वृद्धि
दूर हुई अभिभावकों की टेंशन
सुभाष रोड निवासी शीना डोगरा ने बताया कि ट्रेनिंग प्रोग्राम के बाद सात वर्षीय बेटी शानवी काफी कान्फिडेंट हो गई है। अब उसे पढ़ाई के लिए बोलना नहीं पड़ता।
शाम को तय वक्त पर वह खुद किताबें खोल बैठ जाती है। दिलाराम बाजार निवासी मीनाक्षी सिंघल ने बताया कि उनका बारह वर्षीय बेटा शाश्वत बेहद शैतान था। इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के बाद शैतानी तो कम हुई ही है, साथ में कंसनट्रेशन लेवल बढ़ा है और अब वह स्ट्रेस फ्री भी रहता है।