उत्तराखंड के महिला नेताओं की जुबान पर तालाबंदी
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उत्तराखंड में संघर्ष गाथा लिखने वाली महिलाओं को सियासदां की पुरुषवादी सोच लोकसभा और विधानसभा चुनावों में हाशिए पर डाल देती है। यह सवाल सभी को सालता है कि उत्तराखंड राज्य के गठन को लेकर जो महिलाएं अबला से सबला बनकर सड़कों पर उतर पड़ी थीं वे प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भागीदार क्यों नहीं बन सकतीं?
पचास प्रतिशत आरक्षण का लाभ लेकर पंचायतों पर कब्जा करने से भले ही महिलाएं गदगद हों लेकिन जब विधानसभा और लोकसभा चुनाव का जिक्र होता है तो महिला नेताओं की जुबान पर तालाबंदी हो जाती है।
मतलब साफ है, जहां जहां आरक्षण है वहीं इस आधी आबादी का राज है और जहां खुला मुकाबला है तो वहां परिदृश्य से गायब है। कभी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में टिकट पाने के लिए महिलाओं ने कभी जोरदार तरीके से दावा भी पेश नहीं किया।
महारानी हैं तो मिला टिकट
टिहरी से माला राज्य लक्ष्मी के लोकसभा का टिकट पाने के पीछे उनके उनका राजघराने से ताल्लुक होना है। रेणुका रावत को हरिद्वार से टिकट मिलने की वजह भी उनके पति हरीश रावत का मुख्यमंत्री होना है।
वर्ना असलियत यह है कि 1951 से आजतक मात्र तीन महिला सांसद ही चुनी जा सकी है। नैनीताल से इला पंत ने 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की लहर के बहाने नारायणदत्त तिवारी को हराया।
वर्ना क्या वजह हो सकती है कि उत्तराखंड के गठन के लिए चलाए गए आंदोलन की कमान महिलाओं के हाथ में थी और शराब बंदी से लेकर वृक्ष काटने के विरोध में भी आंदोलन महिलाओं ने ही चलाए। टिहरी में भी ऐसा ही हुआ।
1951 में टिहरी राजघराने की रानी कमलेंदुमति शाह इस सीट से सांसद चुनी गई। या फिर उप-चुनाव में टिहरी से ही साकेत बहुगुणा को हराकर मालाराज्य लक्ष्मी शाह सांसद बनीं।
मात्र पांच महिला विधायक
सवाल यह है कि राज्य की सत्तर विधानसभा सीटों पर भी मात्र पांच महिला विधायक हैं। सवाल यह है कि राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण है।
पिछले 2008 के पंचायत चुनाव में महिलाओं ने आरक्षण से भी ज्यादा लगभग 56 प्रतिशत सीटों पर कब्जा किया। लेकिन लोकसभा व विधानसभा चुनाव में ये महिलाएं जोरदार ढंग से अपनी दावेदारी पेश नहीं करती हैं।
न्यूनतम सात जिला पंचायत अध्यक्ष महिला होती हैं लेकिन विधायक व सांसद बनने के समय उनका गणित कमजोर हो जाता है।
62 साल में कुमाऊं से एक महिला सांसद
शराब विरोधी आंदोलन से लेकर हक-हकूक की लड़ाई में महिलाएं आगे रही। सड़क पर उतर कर आंदोलन किया। चिपको आंदोलन के कारण प्राकृतिक संपदा बची। लेकिन जन विरोधी बातों के लिए मुखर महिलाओं की आवाज केवल आंदोलन तक ही सिमट कर रह गई।
जब सत्ता की बात आई तो यह महिलाएं कहां गुम हुई पता नहीं चला। महिला सांसद भेजने में कुमाऊं पीछे ही रहा है। 62 साल से अब तक केवल एक महिला ही लोकसभा पहुंची।
जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों लोकसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की वकालत की। इस चुनाव में भी टिकट देने में महिलाओं को पीछे छोड़ दिया गया है। आंदोलन से निकलीं यह महिलाएं सत्ता तक पहुंचती तो संभवत: ज्यादा प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रख पातीं।
सिर्फ एक साल सांसद रहीं इलापंत
नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट पर इला पंत 1998 से 1999 तक केवल एक साल तक सांसद रहीं। हालांकि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और आजादी के बाद से अब तक के सारे चुनाव दे चुके सत्य प्रकाश के दावों को सही माने तो नैनीताल-उधम सिंह नगर सीट जो कि उस समय बहेड़ी तक था।
उस समय सोशलिस्ट पार्टी 1952 और 1957 से किच्छा के रहने वाली मिसेज सिविल खान को चुनाव में उतारा था। वह दोनों चुनाव में दूसरे स्थान पर रही थी। सत्यप्रकाश ने खुद 1962 के चुनाव में लोकसभा का चुनाव लड़ा था और तीसरे स्थान पर रहे थे। 2004 में अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट से रेणुका रावत ने चुनाव लड़ा था। रेणुका रावत दूसरे स्थान पर रही थीं।