उत्तराखंड : ‘विशेष जैल’ से बुझेगी जंगलों की आग, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के वैज्ञानिकों ने किया तैयार
डीआरडीओ नई दिल्ली के वैज्ञानिकों की टीम ने देहरादून में वन विभाग और अग्निशमन विभाग के अधिकारियों के साथ जंगल में कृत्रिम आग लगाकर फायर जैल का ट्रायल भी किया।
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वनाधिकारियों, वनकर्मियों के साथ ही अग्निशमन कर्मियों के लिए यह खबर राहत देने वाली है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिकों ने एक विशेष प्रकार का फायर जैल तैयार किया है। इसके जरिए न सिर्फ आग की घटनाओं पर तत्काल काबू पाया जा सकता है, वरन वनाग्नि की घटनाओं को भी रोका जा सकता है।
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डीआरडीओ नई दिल्ली के वैज्ञानिकों की टीम ने देहरादून में वन विभाग और अग्निशमन विभाग के अधिकारियों के साथ जंगल में कृत्रिम आग लगाकर फायर जैल का ट्रायल भी किया। वन विभाग के अधिकारियों की मानें तो डीआरडीओ के वैज्ञानिकों का ट्रायल काफी हद तक सफल रहा है।
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भारतीय वन सर्वेक्षण के ही आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के तमाम राज्यों में 22622 हेक्टेयर जंगल अत्यंत अग्नि प्रवण की श्रेणी में शामिल हैं। 42495 हेक्टेयर जंगल बहुत अधिक अग्नि प्रवण श्रेणी में, जबकि, 75792 हेक्टेयर जंगल अति अग्नि प्रवण श्रेणी में शामिल हैं। संवेदनशील इन तमाम जंगलों में हर साल बड़े पैमाने पर आग लगने की घटनाएं होती हैं।
जैल को पानी में मिलाकर तैयार की फायर लाइन
हालांकि, भारतीय वन सर्वेक्षण के वैज्ञानिक सेटेलाइट के जरिए 24 घंटे जंगलों की निगरानी करते हैं और जहां पर भी आग लगने की घटना होती है, संबंधित राज्यों के आला अधिकारियों को तत्काल इसकी जानकारी दी जाती है।
लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद जंगलों में आग लगने की घटनाएं साल दर साल बढ़ती जा रही हैं।
ऐसे में अब डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने वनाग्नि पर प्रभावी अंकुश के लिए विशेष प्रकार का फायर जैल तैयार किया है। डीआरडीओ वैज्ञानिक केसी वाधवा की अगुवाई में देहरादून से सटे थानों क्षेत्र के जंगलों में विशेष फायर जैल का ट्रायल किया गया। वन विभाग के एसडीओ बीबी मर्तोलिया के मुताबिक फिलहाल ट्रायल काफी हद तक सफल रहा है।
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि डीआरडीओ वैज्ञानिकों ने जैल को पानी में मिलाकर फायर लाइन बनाई। परिणामस्वरूप आग आगे नहीं फैल पाई और प्रयोग बेहद सफल रहा। एसडीओ ने बताया कि एक बार स्प्रे करने पर जैल का प्रभाव चार-पांच दिनों तक रहता है और आग आगे नहीं बढ़ पाती।
यह प्रयोग मैदानी क्षेत्रों के जंगलों में लगने वाली आग के लिए काफी कारगर है। पर्वतीय क्षेत्रों के जंगलों में आग लगने पर फायर जैल का कोई खास उपयोग नहीं होगा। इसके लिए डीआरडीओ वैज्ञानिकों को कोई और तकनीक विकसित करनी होगी।