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एक्सीडेंट: बच्चों की चीखें किसी को जगाती क्यों नहीं?

Wed, 09 Mar 2016 08:28 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 09 Mar 2016 08:28 AM IST
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why schools and parents allowing bike to child.
सड़क हादसा - फोटो : amar ujala

पुलिस के स्लोगन और समाचार पत्रों के जागरूकता अभियान का असर शहर की सड़कों पर नजर नहीं आता है। इसका जिम्मेदार कौन है? जवाब है आप। ‘लाडले को बाइक नहीं जिदंगी दें’ यह बात कई बार अभिभावकों को समझाई गई पर उन्हें समझ में नहीं आई।

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इसके बाद पुलिस ने दूसरा रास्ता अपनाया और स्कूल संचालकों को समझाया कि बाइक और स्कूटी से स्कूल आने वाले नाबालिग बच्चों पर सख्त कार्रवाई करें। पर स्कूल संचालकों पर भी असर नहीं हुआ।
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पिछले दिनों दून एसएसपी सदानंद दाते ने सड़क हादसों पर कंट्रोल करने के लिए स्कूल संचालकों के साथ बैठक लेकर यह बात समझाई थी पर हार बार की तरह फिर स्कूल वालों ने कप्तान की बात एक कान से सुनी दूसरे से निकाल दी।  सवाल उठता है कि अभिभावकों और स्कूल संचालकों के गैर जिम्मेदाराना रवैये की भेंट कब तक प्रत्युष ऐसे बच्चे चढ़ते रहेंगे। हां एक बात और पुलिस को अब और सख्त होना पड़ेगा। 
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क्या कहता है कानून 
मोटर व्हिकल एक्ट के मुताबिक 18 साल से कम उम्र का बच्चा केवल 80 सीसी से कम क्षमता वाला वाहन ही चला सकता है लेकिन राजधानी में नाबालिग बच्चे 100 से 250 सीसी क्षमता वाले वाहन फर्राटेदार दौड़ा रहे हैं। पुलिस प्रशासन को भी और सख्त होने के साथ ही स्कूलों को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना होगा।

पुलिस कर रही सख्ती
वाहन चलाने वाले नाबालिग बच्चों को रोककर परिजनों को नसीहत दी जा रही है, लेकिन अभिभावक और स्कूल संचालक गंभीरता नहीं दिखा रहे है। नाबालिग बच्चों के वाहन लेकर स्कूल आने पर सख्ती से रोक लगाने के लिए नए सिरे से स्कूल संचालकों से बात की जाएगी। 
-धीरेन्द्र गुंज्याल, एसपी ट्रैफिक। 

हमारी एसोसिएशन लगातार नाबालिगों को स्कूल में वाहन ले जाने पर पाबंदी लगाने की मांग करती आ रही है। वाहन लेकर स्कूल आने वाले बच्चों की एंट्री स्कूलों में बंद होनी चाहिए। हम जल्द ही जिलाधिकारी से मिलकर इस संबंध में वार्ता करेंगे। 

-नीरज सिंघल, अध्यक्ष, ऑल उत्तराखंड पैरेंट्स एसोसिएशन

डिग्गी में रहा हेलमेट
छात्र प्रत्यूष जोशी हादसे के समय हेलमेट नहीं पहने था, जबकि उसका हेलमेट स्कूटी की डिग्गी में रखा था। पुलिस ने डिग्गी खोली तो हेलमेट अंदर मिला। प्रत्यूष हेलमेट पहने होता तो शायद उसकी जान बच सकती थी। दून जिले में हादसों में अधिकांश मौत हेलमेट न पहने की वजह से हो रही है। कैंट और क्लेमेंटाउन क्षेत्र में हेलमेट नहीं पहनने से कई छात्राें की मौत हो चुकी है, लेकिन कोई भी उससे सबक लेने को तैयार नहीं है।

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