तो इसलिए मुंसिफ बनने ने बचे हरीश रावत
- इंदिरा से वापस कराई स्टिंग प्रकरण की सीबीआई जांच की अधिसूचना
- खुद निर्णय लेते तो कड़ी आलोचना झेलनी पड़ती
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किसी बहुत महत्वपूर्ण मिशन पर नहीं होने के बावजूद हरीश रावत ने रविवार की कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता नहीं की। उनके स्टिंग आपरेशन की सीबीआई जांच के निर्णय को वापस लेना था, इसलिए उन्होंने अपने ही बारे में फैसला लेने वाली कैबिनेट से परहेज किया। वर्ना ऐसी कोई वजह नहीं थी, एक दिन पहले ही शनिवार की कैबिनेट के बाद रविवार को फिर बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता वित्त मंत्री इंदिरा ह्दयेश ने की।
जल्दबाजी में उठाया कदम
रविवार को हुई स्पेशल कैबिनेट में भाग नहीं लेकर हरीश रावत खुद के मामले में मुंसिफ बनने से बचे। उन्होंने यह जिम्मेदारी वरिष्ठ मंत्री इंदिरा ह्दयेश को दी। यह कदम काफी सोच समझकर उठाया गया। जल्दबाजी भी जायज थी। यदि एक दो दिन में सीबीआई इस मामले में मुकदमा कायम कर देती तो जांच वापस करने की सिफारिश करना नामुमकिन था। लेकिन, इस मामले को लेकर सरकार खुद संदेह के घेरे में है।
सवाल यही है कि आखिर सीबीआई से अचानक दूरी बनाने के पीछे क्या वजह है। कैबिनेट की इस सिफारिश को सीबीआई मानेगी कि नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि राज्य की किसी एजेंसी में इतनी क्षमता नहीं है कि मुख्यमंत्री के खिलाफ जांच कर सके। विपक्ष तो उंगली उठा रहा है कि खुद की इज्जत बचाने के लिए हरीश ने कैबिनेट से यह फैसला करवाया।
कैबिनेट के फैसले पर बहुगुणा ने उठाया सवाल
पूर्व सीएम विजय बहुगुणा कहते है कि 1994 में सिक्किम के पूर्व सीएम दोरजी के खिलाफ सीबीआई जांच की सिफारिश हुई, फिर वह सीएम बन गए। बिल्कुल इसी तरह उन्होंने भी जांच वापस लेने की अधिसूचना वापस ली, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जांच की सिफारिश का अधिकार तो राज्य के पास है, लेकिन वापस लेने का अधिकार नहीं है।
दूसरा एक मामला के मरियम बनाम केरल राज्य का है। सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अप्रैल 1998 में भी यही कहा कि एक बार सीबीआई जांच को राज्य वापस नहीं ले सकते। मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह ने यह तर्क तो दिया कि आपराधिक मामलों में जांच का अधिकार राज्य को है, लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं दे सके कि क्या भविष्य में किसी भी आपराधिक मामले की जांच सीबीआई के हवाले नहीं होगी।