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न झोली भरी न पेट, किसान मायूस
महेश कुमार/अमर उजाला, त्यूनी
Updated Sat, 14 Dec 2013 12:04 PM IST
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पहले सूखे और फिर ज्यादा बारिश ने कथियान बेल्ट में राजमा की खेती को चौपट कर दिया। स्थिति यह हो गई कि उत्पादन करने वाले किसानों तक को इस बार राजमा चखने को नहीं मिली। मौसम की मार से उत्पादन में आई भारी गिरावट से किसान मायूस हैं।
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तहसील के सिलगांव खत के अधिकांश गांवों की आजीविका का मुख्य साधन राजमा की खेती है। यहां 40-50 हेक्टेयर भूमि पर इसकी खेती की जाती है।
स्वादिष्ट और चटक लाल रंग इसकी असली पहचान है। किसानों ने अप्रैल में बड़ी उम्मीदों के साथ राजमा की बुआई की, लेकिन बारिश न होने से अधिकांश फसल सूखे की भेंट चढ़ गई।
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किसानों को आशा थी कि बरसात में एक बार फिर खेत लहलहा उठेंगे, लेकिन रही सही कसर अगस्त माह में हुई भारी बारिश से पूरी कर दी। ज्यादा बारिश होने से फिर से फसल मौसम की बेरुखी का शिकार हो गई।
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किसानों का दर्द
भटाड़ गांव के वीरेंद्र शर्मा का कहना है कि इस बार राजमा चखने तक को नहीं मिली। पहले इससे कमाई भी होती थी और स्वाद का लुत्फ भी उठाते थे। पुराटाड़ के शांतिराम डोभाल का कहना है कि दो बार फसल मौसम की बेरुखी का शिकार हो गई। अधिकांश किसानों के हाथ कुछ नहीं लगा।
यहां होती है खेती
कथियान बेल्ट के भटाड़, छजाड़, हरटाड़, भुनाड़, ऐठाड़, डांगुठा, फटियूड़, भूट, फनार, डेरनाड़, पुरटाड़, बगूर, उभेराशेर समेत एक दर्जन गांवों में राजमा की खेती होती है।
ये है विशेषता
स्वाद के लिए अलग पहचान रखने वाली कथियान बेल्ट की राजमा करीब एक इंच लंबी होती है। इसमें 40-50 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। गांव में ही राजमा 100-120 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिक जाती है। यहां की राजमा की सहारनपुर, दिल्ली, कानपुर और आगरा की मंडियों में भारी डिमांड है।
दो बार होती है बुआई
राजमा से साल में दो बार उत्पादन लिया जाता है। पहली बुआई अप्रैल और दूसरी बुआई अगस्त माह में की जाती है।
वर्ष------------------उत्पादन (क्विंटल)
2008---------------180
2009---------------170
2010---------------200
2011---------------190
2012---------------200
2013---------------04
स्रोत : उद्यान प्रभारी कार्यालय चौसाल