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सरकारी धन की बर्बादी: ‘हवाई पुल’ से लगी लाखों की चपत, प्रथम दृष्टया सात इंजीनियरों को पाया दोषी

Sat, 01 Jun 2019 11:22 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 01 Jun 2019 11:22 AM IST
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Waste of government money behind bridge construction
प्रतीकात्मक

प्रदेश सरकार में सरकारी धन की बर्बादी का एक ऐसा मामला सामने आया, जिसमें एक पुल बना ही नहीं और सरकारी खजाने को अब तक लाखों रुपये की चपत लग चुकी है। इस ‘हवाई पुल’ की कहानी तब और भी ज्यादा गंभीर हो गई, जब शासन को पता चला कि ठेकेदार कंपनी को लाखों रुपये का भुगतान करना पड़ रहा है, जबकि उसने पुल पर काम तक शुरू नहीं किया। विभाग ने इस मामले में सात इंजीनियरों को प्रथम दृष्टया दोषी पाया। शासन ने उनके खिलाफ चार्जशीट दायर करे के आदेश पारित कर दिए हैं। 

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दरअसल, पुल पर काम करने से पहले ही भूकंपीय दृष्टि से पुल निर्माण का प्रस्ताव बदल दिया गया। कंपनी आर्बिट्रेशन में चली गई कि उसने पुल निर्माण के लिए चयनित स्थल पर सामग्री जुटा ली थी और उसका अवशेष भुगतान नहीं हुआ। आरोप है कि आर्बिट्रेटर के कंपनी के हक में आदेश के बावजूद 13 सालों से लोनिवि के इंजीनियर सोते रहे और उन्होंने प्रकरण के निपटारे के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए। नतीजा यह है कि एक ऐसे पुल परसरकार का खर्च 59.73 लाख तक पहुंच चुका है जो बना ही नहीं।
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ये है प्रकरण 
वर्ष 2006 में चमोली जनपद के जोशीमठ में ऋषि गंगा नदी पर पैंग मुरंडा मार्ग में 70 मीटर झूला पुल स्वीकृत हुआ था। इस पुल के निर्माण के लिए 90 लाख रुपये की स्वीकृति हुई। मैसर्स हिलवेज कंपनी से अनुबंध गठित हुआ। लेकिन पुल का प्रस्ताव यह कहकर निरस्त कर दिया गया कि भूकंप की संभावना के चलते चयनित स्थल उपयुक्त नहीं है। स्वीकृति के आठ दिन बाद कंपनी को 39 लाख 42 हजार 993 रुपये का अग्रिम भुगतान कर दिया। आरोप है कि उत्तरदायी अभियंताओं ने बिना सामग्री लाए और बिना बैंक गारंटी के भुगतान किया। 18 मार्च 2017 को देहरादून के तत्कालीन मुख्य अभियंता ने जो जांच रिपोर्ट सौंपी, उसमें उन्होंने बताया कि कार्यस्थल पर पुल का निर्माण नहीं हुआ और 52.23 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। 

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आर्बिट्रेशन से खुली पोल

इस मामले की कलई आर्बिट्रेशन से पारित आदेशों से हुई। जब प्रकरण शासन में पहुंचा तो इसकी जांच कराई गई। पता चला कि 3,65,808 रुपये की अवशेष राशि को लेकर कंपनी आर्बिट्रेशन में गई और अब तक  अवार्ड की धनराशि और 18 प्रतिशत ब्याज को जोड़कर कुल धनराशि में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है।

हालांकि गोपेश्वर प्रांतीय खंड की ओर से ये बताया गया कि कंपनी को जो अग्रिम भुगतान हुआ, उसके एवज में विभाग ने उसकी 39.42 लाख रुपये लागत की पुल निर्माण की सामग्री कब्जे में ले रखी है और कंपनी पर 3,65,808 रुपये देने शेष थे, जिसके लिए वो आर्बिट्रेशन में चली गई। आर्बिट्रेशन में मामला चलता रहा। एक मई 2016 को घोषित अवार्ड के अनुसार, कंपनी को दिए गए अग्रिम भुगतान को समायोजित करते हुए अब तक कुल खर्च 59,73,144 रुपये हो चुका है। गत 16 अप्रैल तक आर्बिट्रेशन में 22 बार सुनवाई की तारीखें तय हो चुकी हैं।

ये इंजीनियर प्रथम दृष्टया दोषी
वीरेंद्र जौहरी, तत्कालीन सहायक अभियंता, ओम प्रकाश, तत्कालीन अधिशासी अभियंता, रमेश चंद्र पाल, तत्कालीन अधिशासी अभियंता, एसएस तोमर तत्कालीन अधिशासी अभियंता, फिरोज अहमद तत्कालीन अपर सहायक अभियंता, नवीन ध्यानी तत्कालीन कनिष्ठ अभियंता, राजेंद्र कुमार चौधरी तत्कालीन कनिष्ठ अभियंता। इन सभी अभियंताओं को आरोप पत्र गठित कर शासन को भेजे गए हैं।

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