भाजपा क्षत्रपों की आंख की किरकिरी बने उत्तराखंड के पूर्व सीएम
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उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, भाजपा के क्षत्रपों पर बल पड़ते नजर आ रहे हैं।
इनके इस तनाव की सबसे बड़ी वजह है कांग्रेस से बगावत करके भाजपा में शामिल हुए विजय बहुगुणा को आलाकमान से मिलती तरजीह। टिकट बंटवारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने से लेकर पार्टी के स्टार प्रचारकों में शामिल होने के अलावा बहुगुणा दिल्ली तक अपनी मजबूत पैठ बनाए हैं।
अपने अलग अंदाज में काम करने के लिए पहचाने जाने वाले बहुगुणा एक समय कांग्रेस आलाकमान के काफी करीबी थे। इसी के चलते उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, मगर 2013 की आपदा के बाद उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी। उत्तराखंड की सियासत में यह बात जगजाहिर है कि हरीश रावत और बहुगुणा के बीच संबंध कभी बेहतर नहीं रहे।
कांग्रेस से बगावत करके भाजपा का दामन थामा
हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह तल्खियां इस कदर बढ़ीं कि बहुगुणा ने राज्य में कैबिनेट मंत्री रहे हरक सिंह रावत और कांग्रेस के कई दिग्गजों के साथ 18 मार्च 2016 को कांग्रेस से बगावत करके भाजपा का दामन थाम लिया।
उसके बाद से बहुगुणा की कोशिश हमेशा से हरीश रावत को अकेला करने की रही। हालांकि बहुगुणा जब भाजपा में शामिल हुआ तो कई महीनों तक उनका अतापता नहीं रहा। मगर बहुगुणा शायद सही समय का इंतजार कर रहे थे।
यह सही समय आया विधानसभा चुनाव के ठीक पहले। चुनाव पास आते ही बहुगुणा ने ऐसी गणित भिड़ाई कि कांग्रेस के तमाम बड़े नाम ताश के पत्तों की तरह बिखरकर भाजपा की झोली में आ गिरे।
पूर्व मुख्यमंत्रियों की तिकड़ी भी इससे खुश नहीं
खबर है कि बहुगुणा की इसी निष्ठा को देखकर पार्टी आलाकमान उनसे इतना प्रसन्न है कि प्रदेश से जुड़े तमाम अहम मुद्दों पर बहुगुणा से भी राय ली जा रही है। आलाकमान से यही नजदीकी भाजपाई दिग्गजों की आंख की किरकिरी बन गई है। न केवल प्रदेश नेतृत्व बल्कि भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्रियों की तिकड़ी भी इससे खुश नहीं नजर आती।
सूत्रों की मानें तो जिस तरह से बहुगुणा ने अपनी पकड़ और कद को भाजपा में बढ़ाया है, उससे भाजपा के अंदरखाने असंतोष की आग भी सुलगने लगी है।
राज्य के कई नेताओं ने अपनी आपत्ति भी ऊपर तक दर्ज करवाई, लेकिन बहुगुणा के सियासी दांवों का लोहा मान चुके आलाकमान ने किसी की एक नहीं सुनी। अब खबर यह है कि चुनाव निपटने के बाद यह नाराजगी उभरकर सामने आ सकती है।