हरीश रावत तो बोल्ड थे, कुंजवाल ने नो बॉल देकर बचा लिया: बहुगुणा
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विजय बहुगुणा 690 दिनों तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। आरोप है कि भाजपा ने हर दिन उनकी राह में कांटे बिछाने की कोशिश की। बहुगुणा पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए उनका पुतला दहन भी किया। आज वही बहुगुणा भाजपा के खेमे में हैं। वह भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य तो हैं ही, आने दिनों में उन्हें अहम जिम्मेदारी भी मिल सकती है।
आखिर क्या वजह रही है कि बहुगुणा को कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आना पड़ा? हरीश रावत ने उनको किस तरह से परेशान किया? 18 मार्च को कांग्रेस के नौ विधायकों ने विपक्ष के साथ मिलकर रावत सरकार को अस्थिर करने की जो कोशिश की थी, वह कामयाब क्यों नहीं पाए? इस बगावत की वजह क्या थी? किन वजहों से नौ विधायकों की सदस्यता को विधानसभा अध्यक्ष ने खारिज कर दिया ? इन सभी मुद्दों पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अमर उजाला संवाददाता कृष्णेंदु कुमार से अपने विचार साझा किए। आप भी पढ़िए-
ऐसी कौन सी आफत आ गई थी कि आपको पार्टी से बगावत करनी पड़ी?
हरीश रावत मनमानी पर मनमानी किए जा रहे थे। इस बारे में ध्यान दिलाए जाने के बाद भी कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व हरीश रावत पर शिंकजा नहीं कस रहा था। राहुल गांधी से मिलने के लिए मैं दो साल तक वक्त मांगता रहा, लेकिन उनको फुर्सत नहीं थी। ऐसे में हमारे पास विकल्प ही क्या था? कांग्रेस ने यहां अरुणाचल प्रदेश और मेघालय की तरह डैमेज कंट्रोल की कोशिश नहीं की। हम तो सिर्फ गलत कार्यप्रणाली की वजह से हरीश रावत को हटाने की मांग कर रहे थे। पार्टी ने हमारी नहीं सुनी।
हमने तो हरीश रावत को बोल्ड भी कर दिया था, वो कुंजवाल ने सही गेंद को नो बॉल करार दिया। हरीश रावत की सरकार कुंजवाल की बैसाखी के सहारे चल रही है। अगर कुंजवाल ने अपने पद का दुरुपयोग नहीं किया होता तो आज न तो यह सरकार होती और न ही हरीश रावत मुख्यमंत्री। किशोर उपाध्याय ने भी रावत के साथ मिलकर बहुगुणा व हरक को पार्टी से दरकिनार करने की योजना पर अमल करना शुरू कर दिया था। ऐसे में हमारे सामने एक ही रास्ता था। ..और हां 18 मार्च को नहीं, हम मई में भाजपा में गए हैं।
आगे देखिए बहुगुणा के इंटरव्यू का वीडियो
'हरीश रावत ने मुझे एक दिन सांस नहीं लेने दी'
क्या हरीश रावत ने बागी विधायकों के सम्भालने की कोशिश नहीं की थी?
रावत ने हर संभव कोशिश की थी हमें तोड़ने की। सुबोध उनियाल को 19 मार्च को मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन हमारे साथियों ने इस भ्रष्ट सरकार में मंत्री पद नहीं स्वीकार किया। हरक सिंह रावत भी मंत्री पद छोड़कर हमारे साथ आए थे। ऐसा भी नहीं था कि हम में से कोई प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना चाहता था। हम तो हरीश रावत से छुटकारा पाना चाहते थे, लेकिन पार्टी को यह कबूल नहीं था।
2017 में पता चल जाएगा कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने हरीश रावत को बरकरार रखकर पार्टी का कितना बड़ा नुकसान किया है। रावत के पास लोगों की आंखों में धूल झोंकने का फार्मूला है। पहले कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की आंखों में धूल झोंका और जब जनता की आंखों में झोंक रहे हैं। जब नारायण दत्त तिवारी प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो इन्हीं हरीश रावत ने सोनिया गांधी तक के पुतले फूंके थे।
जब आप प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो आपकी कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे थे ?
जब तक मैं मुख्यमंत्री रहा, हरीश रावत ने मुझे एक दिन भी चैन की सांस नहीं लेने दी। गोविंद सिंह कुंजवाल मेरे निर्णय पर टिप्पणी करते थे। उस वक्त रावत के साथ मात्र सात विधायक थे, जो विधानसभा में काली पट्टी बांधकर आते थे और धरना देते थे। हमने प्रदेश के विकास के लिए कई योजनाएं तैयार कीं। पर्वतीय जनपदों में विकास का खाका तैयार किया गया।
गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए जब वहां विधानसभा के भवन का शिलान्यास हुआ था तो हरीश रावत वहां नहीं पहुंचे थे। रावत ने सोनिया गांधी को भी वहां जाने से मना कर दिया। हरीश रावत ने 16 दिनों तक लोकसभा में नहीं जाने का नाटक किया। मेरी कार्यशैली पर सवाल एकदम आधारहीन है।
'तब इंदिरा मुझे हटाने को दिल्ली जाकर बैठ गई थीं'
कहा जाता है कि 2013 में जब आपदा आई थी तो आप तीन दिनों तक दिल्ली में बैठे रहे ?
जब आपदा आई थी तो सूचना मिलते ही मैं हेलीकॉप्टर से केदारधाम गया था। इसके बाद मैं प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली गया था। मैंने प्रधानमंत्री से मुलाकात कर एयरफोर्स की मदद के बारे में बात की। सिर्फ छह घंटे मैं दिल्ली में रुका था। यशपाल आर्य और हरक सिंह रावत भी मेरे साथ थे।
सच्चाई तो यह है कि केंद्र में मंत्री रहते हुए भी हरीश रावत ने आपदा को लेकर किसी तरह की मदद नहीं की। इंदिरा ह्दयेश तो दिल्ली में ही जाकर बैठ गई थीं। छह माह तक किसी भी आपदा प्रभावित क्षेत्र में नहीं गईं। दिल्ली में जाकर बहुगुणा को हटाओ, मुझे सीएम बनाओ की रट लगाती रहीं। मुख्यमंत्री बनने के बाद हरीश रावत ने आपदा प्रबंधन को लेकर जांच भी कराई है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने मेरे कार्यकाल में आपदा प्रबंधन को लेकर कहीं कोई कमी नहीं निकाली है।
आप पर आरोप है कि मुख्यमंत्री रहने के दौरान आपने कई राजनीतिक फैसले अपने पुत्र साकेत के दबाव में लिए?
मुख्यमंत्री के फैसलों पर कैबिनेट की मुहर लगती है, उसके किसी पारिवारिक सदस्य की नहीं। साकेत ने लोकसभा का चुनाव लड़ा था। उसने क्षेत्र में जनता से कई वादे कर रखे थे, इसको लेकर वह मंत्रियों से मिलता था। इसका मतलब यह तो नहीं निकाला जा सकता है कि साकेत के दबाव में ही मेरी सरकार फैसला लेती थी।
'मोदी से प्रभावित होकर भाजपा में आया हूं'
आप तो कानून के माहिर हैं। ऐसे में आपने भाजपा के लेटर पैड पर हस्ताक्षर क्यों कर दिए, जिससे आप लोगों की सदस्यता तक चली गई?
जहां तक लेटर पैड का सवाल है, वह नेता प्रतिपक्ष का था। हमने लेटर पैड पर इसलिए हस्ताक्षर किए कि हम राज्यपाल को बताना चाहते थे कि हमने भाजपा के विधायकों के साथ विनियोग बिल का विरोध किया है। हमारी सदस्यता स्पीकर ने इसलिए खारिज नहीं की है कि हमने लेटर पैड पर हस्ताक्षर किए थे। हमारी सदस्यता तो इसलिए खारिज की गई है आप राज्यपाल के पास क्यों गए?
अब आप भाजपा में हैं। जब सीएम थे तब भाजपा ने आपकी मुखालफत में कोई कसर छोड़ी, अब उनसे कैसे साथ निभेगा ?
मैं किस पद या कुर्सी की लालच में भाजपा में शामिल नहीं हुआ हूं। प्रदेश की जनता ने मुझे सब कुछ दिया है। सांसद रहा, मुख्यमंत्री रहा अब और क्या चाहिए? मैं तो सिर्फ नरेंद्र मोदी की नीतियों से प्रभावित होकर भाजपा में आया हूं। पार्टी जिस तरह से चाहे मेरा सदुपयोग करे। पार्टी जो जिम्मेदारी मुझे सौंपेगी, उसे निभाने के लिए मैं तैयार हूं।
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'मुझमें इतनी क्षमता नहीं कि अलग पार्टी बना सकूं'
हेमवती नंदन बहुगुणा की विरासत का क्या होगा ?
जब भी मौका आया मेरे पिता जी (हेमवती नंदन बहुगुणा) ने राष्ट्रहित में आवाज उठाई। आपातकाल का जोरदार विरोध किया। मोरारजी देसाई की सरकार में मंत्री रहे। जब उन्होंने अंतिम सांस ली, उस वक्त वो कांग्रेस में नहीं थे। उन्होंने नई पार्टी बना रखी थी। मुझमें इतनी क्षमता नहीं है कि मैं अलग पार्टी बना सकूं। जहां तक उनकी विरासत का सवाल है तो उन्होंने राष्ट्र हित में अपनी आवाज उठाई थी, मैंने प्रदेश हित में। अगर भाजपा में रहते हुए भी मुझे लगेगा कि कुछ गलत हो रहा है, तो मैं फिर आवाज उठाऊंगा।
सितारगंज विधानसभा सीट के मामले में आप पर परिवारवाद बढ़ाने का आरोप है ?
मैंने तो साफ कह रखा है कि 2017 का विधानसभा चुनाव मैं नहीं लडूंगा। सौरभ वहां पिछले तीन सालों से काम कर रहा है। अगर भाजपा चाहेगी तो उसे वहां चुनाव लड़ाएगी। इसके लिए मैं किसी से कुछ कहने नहीं जाऊंगा। यह फैसला तो पार्टी करेगी कि वहां से चुनाव कौन लड़ेगा?
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