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जानवरों को बचाते-बचाते बन गया आईएफएस

Mon, 23 Feb 2015 10:04 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 23 Feb 2015 10:04 AM IST
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vaibhav become ifs.

संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की भारतीय वन सेवा (आईएफएस) परीक्षा में चयन से वैभव सिंह का वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का सपना पूरा हो गया है।

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देहरादून के वसंत विहार निवासी वैभव ने इस प्रतिष्ठित परीक्षा में अखिल भारतीय स्तर पर 36वीं रैंक हासिल की है। वैभव मानते हैं कि  कड़ी मेहनत के साथ इस कामयाबी का रास्ता उनके बड़े भाई के कदमों ने उन्हें दिखाया।
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शनिवार को अमर उजाला से बातचीत में वैभव ने बताया कि बचपन से ही उन्हें पर्यावरण से लगाव रहा है। इसे और बढ़ाया बड़े भाई डा. अभिषेक सिंह ने। आप्टो इलेक्ट्रिक फैक्ट्री रायपुर में असिस्टेंट वर्क मैनेजर डॉ. सिंह ‘इफेक्ट’ नाम से एक संस्था चलाते हैं, जो वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का काम करती है।
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वैभव बताते हैं कि वन्यजीवों को बचाने की भाई की मुहिम से वह भी जुड़ गए। स्कूल, कालेज की पढ़ाई के दौरान वह भाई के साथ कई जगह जाते थे। इस बीच जानवरों को नजदीक से देखा और पर्यावरण में उनके महत्व को भी समझा।

यहीं से वन अधिकारी बनने की चाह भी जगी। वैभव बताते हैं कि साक्षात्कार के दौरान उनसे उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण, तस्करी, मानव-वन्यजीव संघर्ष आदि पर सवाल पूछे गए। भाई की संस्था से जुड़कर इनकी अच्छी जानकारी थी, लिहाजा साक्षात्कार बेहद शानदार रहा।

दूसरी बार में मिली सफलता

vaibhav become ifs.

वैभव ने बताया कि प्रशिक्षण पूरा होने के बाद वह उत्तराखंड में ही सेवा देना चाहते हैं। उनका कहना है कि वह एक अधिकारी के तौर पर प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या वन्यजीव तस्करी और मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकना चाहते हैं। उन्होंने उत्तराखंड कैडर की ही मांग की है।

वैभव ने बताया कि स्कॉलर्स होम से 12वीं के बाद उन्होंने लखनऊ इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक किया। इसी दौरान सामान्य अध्ययन की कोचिंग भी ली और सिविल सेवा की परीक्षा दी, लेकिन कामयाबी नहीं मिली।

इस दफा भारतीय वन सेवा की परीक्षा पहली बार दी और सफल रहे। अपनी सफलता का श्रेय उन्होंने मुरादाबाद रेलवे से रिटायर्ड डिप्टी चीफ इंजीनियर पिता हरपाल सिंह, माता रीता सिंह और बहन डॉ. नीतू सिंह को भी दिया। बताया कि वे चार भाई-बहन हैं।

सफलता के मंत्र
- परीक्षा में कामयाब होने के लिए सबसे जरूरी है धैर्य, कई बार असफल होने पर भी हिम्मत नहीं छोड़नी चाहिए
- नौकरीपेशा होने की वजह से केवल चार से पांच घंटे ही पढ़ पाता था, लेकिन इतना समय नियमित रखा तो तैयारी बेहतर रही
- परीक्षा पाठ्यक्रम लंबा होता है, पूरी किताब को तीन पेज में समेटकर नोट्स बना लें तो रिवीजन में लाभ मिल सकता है
- वैभव ने मुख्य परीक्षा में फारेस्ट्री और जियोलॉजी विषय चयनित किए थे, बिल्कुल नए विषयों में तैयारी में आसानी हुई

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