यहां काली नजर आ रहीं बर्फ से ढकी रहने वाली हिमालय की पहाड़ियां, पीछे है ये वजह
कम बर्फबारी के कारण इस साल जनवरी में ही हिमालय की पहाड़ियां काली नजर आ रही हैं, जो पहाड़ियां बर्फ से ढकी रहती थीं, उनमें बहुत कम बर्फ बची है। कम हिमपात के कारण इस साल अस्थायी ग्लेशियरों की संख्या भी घटने का अनुमान है। यदि आने वाले दिनों में हिमपात नहीं हुआ तो गर्मियों में हिमालयी नदियों का जलस्तर काफी कम हो जाएगा। मौसम के इस रुख से पर्यावरणविद भी चिंतित हैं।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में नवंबर से मार्च तक जमकर हिमपात होता है। दो दशक पूर्व तक शीतकाल में पूरा हिमालयी क्षेत्र बर्फ से लकदक नजर आता था। हाल के वर्षों में वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण बारिश के साथ ही हिमपात में भी अनियमितता आ गई है। पहले जहां 12 से 15 फीट तक हिमपात होता था, वहां पर अब पांच से आठ फुट तक ही बर्फबारी हो रही है। इस साल मुनस्यारी से मिलम से लेकर धारचूला के गुंजी, कालापानी और दारमा घाटी में लगभग दो फुट से लेकर पांच फुट हिमपात हुआ है।
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जनवरी बीतने को है लेकिन हिमनगरी कही जाने वाली मुनस्यारी में हिमपात नहीं हुआ है। चिंताजनक यह है कि जिस जनवरी के महीने हिमालय बर्फ से ढका रहता था, वे हिमालयी पहाड़ियां पूरी तरह काली नजर आ रही हैं। पंचाचूली की पांचों चोटियों सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में बहुत कम बर्फ है।
दिसंबर अंतिम सप्ताह और जनवरी की शुरुआत में गिरी बर्फ पिघल चुकी है। ऐसे में हिमालय की चोटियों से नीचे का भाग पूरी तरह से काला पड़ चुका है। पर्यावरणविदों ने मौसम में आ रहे इस बदलाव पर चिंता जताते हुए इसे प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ का नतीजा बताया है।
अस्थायी ग्लेशियरों की संख्या में भी आएगी कमी
अधिक हिमपात होने पर अस्थायी ग्लेशियर भी बनते थे। जमीन पर लंबे समय तक नमी बनाए रखने के साथ ही स्थानीय गाड़, गधेरों को रीचार्ज करने में ग्लेशियर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ट्रैकिंग पर जाने वाले पर्यटकों के लिए यह अस्थायी ग्लेशियर मुख्य आकर्षण का केंद्र रहते हैं। कम हिमपात के कारण इस साल अस्थायी ग्लेशियरों की संख्या भी सीमित रहने का अनुमान है। जो ग्लेशियर बने हैं, उनकी बर्फ तेजी से पिघल जाएगी।
कुछ समय पूर्व तक पिथौरागढ़ जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिमपात होने पर छिपला की पहाड़ी भी बर्फ से ढकी रहती थी। इसके बाद पिथौरागढ़ शहर के नजदीकी थलकेदार के जंगल तक हिमपात हो जाता था। बर्फ अधिक गिरती है तो उसके पिघलने का क्रम धीमा रहता है। इससे धरती में नमी बनी रहती है। मौसम अब असामान्य हो गया है। इसका प्रमुख कारण नदियों को रोकना, माइनिंग और वनों का अत्यधिक दोहन है। जलवायु परिवर्तन का संकेत है, लेकिन इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया गया है।
- डॉ. शेखर पाठक, पद्मश्री एवं हिमालय के अध्ययनकर्ता।