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उत्तराखंड : आज भी उतनी ही जरूरत है सुंदरलाल बहुगुणा के संघर्षों की, ऐसे आगे बढ़ेगी उनकी विरासत

Sun, 23 May 2021 03:00 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sun, 23 May 2021 03:00 PM IST
सार

सुंदरलाल बहुगुणा ने कोरोना से संघर्ष करते हुए इस दुनिया को अलविदा कह दिया। समाज की अपनी गतिकी है। व्यक्ति संघर्षों का चेहरा बनता है तो साथ ही साथ वे संघर्ष भी व्यक्ति को गढ़ते हैं, उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।

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Uttarakhand sunderlal bahuguna passes away :  sunderlal bahuguna legacy will grow in this way
पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा - फोटो : facebook/https://www.facebook.com/kanjhappa

विस्तार

दुनिया के प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा अब हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, शराब और पेड़ों के अंधाधुंध कटान के खिलाफ संघर्ष की जो लौ जलाई, उसके ज्वाला बनने का आज भी इंतजार है। उनके संघर्षों की प्रेरणा ही इन ज्वलंत सवालों के उत्तर खोजेगी। अलग-अलग हिस्सों में चल रहे पर्यावरण के संघर्ष ही बहुगुणा की विरासत को आगे बढ़ाने का काम करेंगे। 

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सुंदरलाल बहुगुणा ने कोरोना से संघर्ष करते हुए इस दुनिया को अलविदा कह दिया। समाज की अपनी गतिकी है। व्यक्ति संघर्षों का चेहरा बनता है तो साथ ही साथ वे संघर्ष भी व्यक्ति को गढ़ते हैं, उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। जब तमाम लोग बहुगुणा जी को उनके जाने के बाद याद कर रहे हैं तो यह उन तमाम मसलों को याद करना भी है, जिन के साथ वे जीवन भर जूझते रहे।
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भाकपा नेता व सामाजिक कार्यकर्ता इंद्रेश मैखुरी ने बताया कि पेड़, पहाड़, नदियों के संरक्षण के साथ ही समाज में व्याप्त विभिन्न कुरीतियों के खिलाफ भी सुंदरलाल बहुगुणा ने आंदोलन चलाए। एक दौर था टिहरी में जब दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए कई आंदोलन चले। सुंदरलाल बहुगुणा ने उन आंदोलनों का नेतृत्व किया। जीवन शैली और गैजेट्स के उपयोग में आई तमाम आधुनिकता के बावजूद जातीय भेदभाव आज भी हमारे समाज के माथे पर धब्बा है। उत्तराखंड के समाज में जाति की जकड़न बाकी देश के मुकाबले ऊपरी तौर पर ‘अंडर करंट’ जैसी अवस्था में रहती है, लेकिन जब वह उभरती है तो बेहद विकृत रूप में प्रकट होती है। 

जातीय भेदभाव : दिमाग से निकालना होगा 
अभी दो साल पहले टिहरी जिले के ही जौनपुर क्षेत्र में एक दलित युवक की शादी में कुर्सी पर बैठने के कारण पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। कौन कह सकता है कि ऐसी शर्मसार करने वाली घटना उसी टिहरी जिले में 21वीं सदी में हुई, जिसमें सुंदरलाल बहुगुणा जैसे लोगों ने दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन चलाए। जिस टिहरी जिले में 1950 के दशक में जातीय जकड़बंदी को तोड़ने के लिए तीन अलग-अलग जातियों के परिवार 12 वर्ष तक संयुक्त रूप से परिवार की तरह एक ही छत के नीचे रहे। निश्चित ही जातीय भेदभाव से मुक्ति की लड़ाई मंदिर प्रवेश से अधिक दिमाग से जाति के जहर को बाहर निकालने की लड़ाई है और उसे वहां तक पहुंचाना ही होगा। 

शराबबंदी : समाज को खोखला कर रहा नशा
शराबबंदी के संघर्ष बहुगुणा जी और उनकी जीवनसंगिनी विमला जी ने चलाए। आज राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत बताकर शराब तो सरकारें ही गांव-गांव में पहुंचा रही हैं। शराब को ‘राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत’ बताना एक मिथक है, जिसे इसके दुष्प्रभावों को वैधता प्रदान करने के लिए गढ़ा गया है। आज नशा सिर्फ शराब तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह जितने रूप में समाज को खोखला कर रहा है, उससे निपटने के लिए बहुत बड़ी लड़ाई की जरूरत है।

बांध : नदियों की पारिस्थितिकी हो रही नष्ट 
टिहरी बांध के खिलाफ संघर्ष सुंदरलाल बहुगुणा जी के जीवन का बड़ा संघर्ष था। आज टिहरी से कई गुना बड़े पंचेश्वर बांध का खतरा उत्तराखंड के सिर पर मंडरा रहा है। टिहरी के बाद जलविद्युत परियोजनाओं को छोटी, रन ऑफ द रिवर कह कर उत्तराखंड के चप्पे-चप्पे पर कायम करने की कोशिश की गई। हकीकत यह है कि वे न छोटी हैं, न ही रन ऑफ द रिवर। वे नदियों की पारिस्थितिकी को ही नष्ट करने वाली सुरंग आधारित परियोजनाएं हैं। उनके दुष्परिणाम 2013 में हमने देखे और इसी साल सात फरवरी को उनकी तबाही से हम फिर दो-चार हुए। 

प्रेरणा : लड़ाइयों से प्रेरणा लेकर होगा आगे का संघर्ष
बड़ी पूंजी के एकाधिकार का दौर बहुत तेजी पर है। आज जो विकास का मॉडल हमारे देश में है, प्रकृति के साथ सामंजस्य कायम करने वाला विकास का मॉडल नहीं है बल्कि आक्रांता किस्म का विकास का मॉडल है। विकास के इस विनाशकारी मॉडल से नदी, पहाड़, जंगल और जमीन को बचाने की चुनौती आज बहुगुणा जी के दौर से कहीं बड़ी चुनौती है। अपने हिस्से का संघर्ष उन्होंने किया, आगे का संघर्ष उनकी लड़ाइयों से प्रेरणा और सबक,दोनों लेकर हमें करना होगा।
 

बहुगुणा के वैश्विक प्रभाव का लाभ नहीं ले पाए हम

वनाधिकार आंदोलन के प्रणेता व टिहरी के पूर्व विधायक किशोर उपाध्याय ने बताया कि बहुगुणा जी जब टिहरी में तीन धारे के पास टिहरी बांध के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे तो मैं उनसे मिलने गया। वह मेरे बारे में पहले से जानते थे और पहली बार हिमालय के पर्यावरणीय पहलुओं को उनसे बारीकी से समझा। 1991-92 में हिमालय के विकास के लिए सतत समावेशी नीति के बारे में, उत्तरकाशी को उसका मॉडल बनाने के लिए जब पूरा योजना आयोग टिहरी आया तो योजना आयोग के वरिष्ठ सलाहकार बीएन नवलावाला ने कहा कि टिहरी जाने पर मेरी पहली इच्छा बहुगुणा जी को मिलने की है।

इस तरह का था उनका व्यक्तित्व, जो सबको अपनी ओर खींच लाता था। टिहरी से विधायक चुने जाने के बाद सरकार के रंग-ढंगों और बांध विस्थापित और प्रभावितों की पीड़ा को उकेरने के लिए टिहरी के निकट भगवतपुरम में जब मैंने पहली महापंचायत आयोजित की तो उन्होंने उस प्रयास को भी आशीर्वाद दिया। ‘हिमालय बचाओ, गंगा बचाओ, जल बचाओ और जीवन बचाओ’ आंदोलन के बारे में जब उनसे, विमला जी व राजीव नयन जी से चर्चा की तो वे अस्वस्थ होने के बावजूद इस अभियान को आशीर्वाद देने के लिए तैयार हो गए। हम लोगों ने तीन चरणों में इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई।

पहले चरण में हिमालयी राज्यों की सरकारों, जनप्रतिनिधियों और सिविल सोसाइटी से संवाद, दूसरे चरण में हिमालय से लाभान्वित होने वाले राज्यों पंजाब से प. बंगाल तक की सरकारों, जन प्रतिनिधियों व सिविल सोसाइटी से संवाद तथा तीसरे चरण में हिमालयी देशों जिसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल, चीन, म्यांमार, बांग्लादेश आदि देश थे। वहां के निवासियों के साथ संवाद स्थापित करने की योजना थी। जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक बहुगुणा जी अस्वस्थता के बावजूद गए। 


सोनिया गांधी ने भेजा बहुगुणा के निधन पर शोक संदेश
कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा के निधन पर शोक जताते हुए उनकी पत्नी एवं परिजनों के नाम पर शोक संदेश भेजा। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय व प्रवक्ता गरिमा दसोनी ने कहा कि कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने शोक संदेश में कहा कि देश ने एक महान व्यक्ति को खो दिया है। जिन्होंने अहिंसक प्रतिरोध को अपने गांधीवादी मूल्यों से प्रेरित किया। बहुगुणा का जीवन उनका संदेश था। उनके उद्देश्य की पवित्रता, दृढ़ विश्वास, साहस, सोच उनके कार्य में दिखते थे।

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