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सुंदरलाल बहुगुणा स्मृति शेष : राजनीतिक जीवन छोड़ने की शर्त पर हुई थी विमला नौटियाल से शादी

Sat, 22 May 2021 01:48 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal चंद्रेश पांडे, अमर उजाला, नैनीताल
चंद्रेश पांडे, अमर उजाला, नैनीताल Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 22 May 2021 01:48 PM IST
सार

शुरुआत में बहुगुणा का रुझान राजनीति की ओर था लेकिन जब वर्ष 1956 में उनका विवाह विमला नौटियाल से तय हुआ तो विमला जी की शर्त थी कि यदि वह राजनीतिक रुझान छोड़ समाजसेवा में आएंगे तभी वह उनसे शादी करेंगी।

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Uttarakhand sunderlal bahuguna passes away : he married to vimla nautiyal on condition of give up politics
सुंदरलाल बहुगुणा - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

जाने माने इतिहासकार पदमश्री शेखर पाठक का कहना है कि सुंदरलाल बहुगुणा यदि समाज सेवा के क्षेत्र में न आते तो वह देश की एक जानीमानी राजनैतिक हस्ती के रूप में उभरते। विवाह के दौरान बहुगुणा के जीवन में ऐसा मोड़ आया जिसने उनके जीवन को राजनीति के बजाय समाज और पर्यावरण को समर्पित कर दिया।

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पाठक ने बताया कि वर्ष 1973 में उनकी सुंदरलाल बहुगुणा से पहली बार मुलाकात हुई। वर्ष 1977 में बहुगुणा पहाड़ से जुड़े मुद्दों को लेकर 120 दिन की यात्रा पर निकले थे। तब उन्होंने हमारी पिंडारी यात्रा के संस्मरण पढ़े तो खासे प्रभावित हुए। अस्कोट-आराकोट यात्रा का विचार उन्हें सुंदरलाल बहुगुणा से ही मिला था और इस यात्रा के बाद ही उन्होंने 1974 से लेकर 2014 तक कई यात्राएं कीं और इसी दौरान वह स्वयं भी चिपको आंदोलन से जुड़ गए।
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पद्मश्री पाठक बताते हैं कि जवानी के दौर में बहुगुणा पत्रकार थे और समाज से जुड़े मुद्दों पर उनके लेख राष्ट्रीय स्तर के अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित होते थे। शुरुआत में बहुगुणा का रुझान राजनीति की ओर था लेकिन जब वर्ष 1956 में उनका विवाह विमला नौटियाल से तय हुआ तो विमला जी की शर्त थी कि यदि वह राजनीतिक रुझान छोड़ समाजसेवा में आएंगे तभी वह उनसे शादी करेंगी। यहीं से बहुगुणा के जीवन में अहम मोड़ आया और वह वर्ष 1956 से समाज को समर्पित हो गए।

सर्वोदय और भूदान जैसे आंदोलनों से भी जुड़े

बहुगुणा पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मुद्दों के साथ-साथ सर्वोदय और भूदान जैसे आंदोलनों से भी जुड़े रहे। इन तमाम आंदोलनों के तहत की गई पदयात्राओं ने बहुगुणा के मन में पहाड़ के ज्वलंत मुद्दों को हवा दी। अनुसूचित जाति के लोगों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने से लेकर शराबबंदी को लेकर किए गए आंदोलनों में भी बहुगुणा की अहम भूमिका रही।

वर्ष 1970 में अलकनंदा नदी में आई बाढ़ की विभीषिका के बाद ही बहुगुणा ने चमोली से चिपको आंदोलन की शुरुआत की। आपातकाल के दौरान कुछ समय के लिए चिपको आंदोलन ठहर गया। यह वह समय था जब कुछ आंदोलनकारी जेपी के पक्ष में तो कुछ विनोवा भावे के पक्ष में खड़े नजर आए। वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उम्मीद जगी कि सरकार चिपको आंदोलन की मांगों पर गौर करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके खिलाफ जगह-जगह हुए आंदोलनों ने चिपको आंदोलन को और अधिक हवा दे दी।

पाठक बताते हैं कि उसके बाद जब इंदिरा गांधी की सरकार आई तो उसने चिपको आंदोलनकारियों की कई मांगें मान लीं। उन्होंने बताया कि उसके बाद भी बहुगुणा चुप नहीं बैठे। उन्होंने हिमालयी राज्यों की समस्याओं के समाधान को लेकर कश्मीर से देशभर की यात्रा की। पाठक ने कहा कि ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो अपने जीवन के लगभग 80 साल समाज के लिए होम कर दें। सुंदरलाल बहुगुणा ने पहाड़ और पहाड़ी राज्यों के लिए जो कुछ किया वह हमेशा याद रखा जाएगा।

वर्ष 2010 में आखिरी बार नैनीताल आए थे बहुगुणा
पदमश्री शेखर पाठक बताते हैं कि सुंदरलाल बहुगुणा दसियों बार नैनीताल आए। समय-समय पर उन्होंने यहां कई कार्यक्रमों और कार्यशालाओं में पर्यावरण से संबंधित व्याख्यान दिए। आखिरी बार वह वर्ष 2010 में कुमाऊं विवि के कार्यक्रम में आए थे, लेकिन तब उनसे भेंट नहीं हुई थी।

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