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यादें: सुंदरलाल बहुगुणा ने पैदल ही नाप दी थी 1400 किमी की दूरी, वन संरक्षण के लिए शुरू की थी पैदल यात्रा

Fri, 21 May 2021 10:22 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, टिहरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, टिहरी Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 21 May 2021 10:22 PM IST
सार

शराब बंदी आंदोलन में जनता का अपार समर्थन मिलने के बाद सुंदरलाल बहुगुणा ने जातीय समानता, शराबबंदी, महिला सशक्तिकरण और वन संरक्षण का संदेश पूरे उत्तराखंड में फैलाने की ठानी थी।

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Uttarakhand Sunderlal Bahuguna death News:  Sunderlal Bahuguna started yatra for inviornment protection
सुंदरलाल बहुगुणा - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

1973 में दीपावली के दिन स्व. सुंदरलाल बहुगुणा ने अपने आध्यात्मिक गुरू और डिवाइन लाइफ सोसायटी के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद का आशीर्वाद लेकर 25 अक्तूबर को सिमलासू से पैदल यात्रा शुरू की थी। स्वामी चिदानंद ने कहा था कि भारतीय संस्कृति का महान संदेश फैलाने की शक्ति मैं इस यात्रा में देखता हूं।

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पुरानी टिहरी के सिमलासू से शुरू की गई यात्रा का पहला पड़ाव उन्होंने अपनी जन्मस्थल मरोड़ा गांव को बनाया। जो गांव उन्होंने अपने राजभक्त परिवार से मतभेद के बाद 13 साल की उम्र में छोड़ दिया था। तीन दशक बाद जब बहुगुणा अचानक मरोड़ा पहुंचे तो गांव वाले उनके घर में जुट गए थे।
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इस दौरान उनके साथ भवानी भाई भी थे। राजभक्त के हिमायती गांव वालों ने जब राजशाही के विरोधी श्रीदेव सुमन के साथ राज विरोधी आंदोलन में शामिल होने पर उनसे नाराजगी जताई तो उन्होंने गांव ही छोड़ने का मन बना दिया था।

1400 किमी की पैदल यात्रा से पूरा उत्तराखंड नाप डाला

वहां से अपनी यात्रा जारी रखते हुए वह जौनपुर, जौनसार से रवांई, बावर, रुद्रप्रयाग, चमोली के सुखताल होते हुए ग्वालदम और थराली से कपकोट पहुंचे। वहां से  पिथौरागढ़, अल्मोड़ा  और नैनीताल होते हुए उन्होंने 1400 किमी की पैदल यात्रा से पूरा उत्तराखंड नाप डाला।

यह लंबी यात्रा उन्होंने 22 फरवरी 1974 को  मुनिकीरेती में पूरी की। इस दौरान उनके साथ उनके सहयोगी और सर्वोदयी घनश्याम सैलानी, आनंद सिंह बिष्ट, सुरेंद्रदत्त भट्ट आदि भी मौजूद रहे। यात्रा के दौरान बहुगुणा ने ग्रामीणों को शराबबंदी,  ग्राम स्वराज, जातीय समानता, महिला शिक्षा और स्वावलंबन का महत्व बताते हुए अखबारों के माध्यम से भी ग्रामीणों की समस्याएं भी उजागर की।

जिस गांव में वे विश्राम करते वहां ग्रामीणों को अपनी यात्रा के अनुभव भी सुनाते। बताया जाता है, कि उनकी पीठ पर एक भारी पिट्ठू (बैग) होता था, जिसमें कपड़े और सूत कातने के लिए गांधी का चरखा और किताबें भी होती थी। यात्रा के दौरान उन्होंने देखा कि जहां जंगल काटे गए थे, वहां पहाड़ खिसक रहे थे, लेकिन जहां लोगों ने बांज और चौड़ी पत्ती के जंगलों को संरक्षित रखा था, वहां की फिजा ही अलग थी। इस यात्रा के दौरान उन्होंने तबाही के मंजर भी देखे। उसी दृश्य ने उन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए आंदोलन शुरू करने के लिए प्रेरित किया था।

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